रिटायर्ड अफसरों के बोलने पर प्रतिबंध कहीं सरकार का डैमेज कंट्रोल तो नहीं ?

 

 गौरव चतुर्वेदी / खबर नेशन / Khabar Nation

मीडिया पर अघोषित नियंत्रण और सोशल मीडिया को नियंत्रित करने की असफल कोशिशों के बाद भारत सरकार के वर्तमान कर्ताधर्ता रिटायर्ड आला अफसरों के बोलने पर प्रतिबंध लगाने जा रही है । मोदी सरकार के दूसरे कार्यकाल के दो साल बीत चुके हैं । कुछ सरकार के निर्णय और कुछ कोविड 19 संक्रमण की मार से सरकार की छवि पर जबरदस्त नकारात्मक असर पड़ा है । प्रशासन सहित कई संवैधानिक संस्थाओं के भाजपाई करण और संघीकरण के आरोप लग रहे हैं । आगामी तीन सालों में सरकार को विकास के साथ-साथ अपनी छवि सुधारते हुए 2024 के चुनाव में भी जाना है । सेवानिवृत्त सरकारी अधिकारियों के बोलने पर प्रतिबंध की असल वजह को तलाशती एक समीक्षा ।
सरकार का हालिया फरमान कि अब रिटायर्ड अधिकारी  किसी भी प्रकार की जानकारी को सार्वजनिक नहीं कर सकेंगे । यह सेवानिवृत्त अधिकारियों के बोलने पर प्रतिबंध  कहीं सरकार का डैमेज कंट्रोल तो नहीं है ?

सरकार ने यह संशोधन सेंट्रल सिविल सर्विसेज (पेंशन) अमेंडमेंट रुल्स 2007 में किए हैं।  ऐसा करते पाए जाने पर उनकी पेंशन आंशिक या पूर्ण रुप से रुक सकती है।
केन्द्र सरकार ने यह कदम उस समय उठाया है जब अनेक रिटायर्ड अधिकारी अपनी आवाज मुखरता से बुलंद कर रहे हैं।
सूचना के दायरे में उन सुरक्षा व खुफिया एजेंसियों को शामिल किया गया है। जिन्हें आर टी आई की दूसरी अनुसूची में सूचना देने से छूट है । यानी करीब 20 एजेंसियों के अधिकारियों को रिटायर होने के बाद इस दायरे में लाया गया है । इसके दायरे में सी बी आई,आई बी,रॉ,राजस्व गुप्तचर निदेशालय,ईडी, एविएशन रिसर्च सेंटर,अनेक अर्धसैनिक बल व क्राइम ब्रांच पहले से आ रहे हैं।
आखिर सरकार के इस फरमान की वजह क्या ?
पूर्ववर्ती सेवानिवृत्त अधिकारियों ने अपनी प्रचार प्रियता के चलते कई ऐसे राज उजागर कर दिए जो देश के लिए घातक साबित हुए। इसी के साथ ही इसकी एक और वजह रही जब अधिकारियों को उनके मनमाफिक लाभ नहीं मिले या फिर तत्कालीन सरकारों ने अन्य अफसरों को बेजा लाभ पहुंचाकर अपने मनमुताबिक काम करवाए तो पीड़ित प्रताड़ित अफ़सर या तो विरोधी दलों को सरकार विरोधी जानकारी उपलब्ध कराते रहे या फिर सेवानिवृत्ति के बाद ऐसे राज उजागर कर पूर्ववर्ती सरकारों के काले कारनामे किताब या लेख की शक्ल में उजागर करते रहे। लंबे समय तक देश में कांग्रेस का शासन रहा सो ऐसे अधिकारी पूर्ववर्ती सरकारों के विरोध में भाजपा या अन्य राजनैतिक दलों की गोद में जा बैठे । ऐसे अधिकारी खासकर पुलिस विभाग के ही वरिष्ठ अधिकारियों के रहे। कई सेवानिवृत्त अधिकारी लोकसभा,राज्यसभा, विधानसभा में चुनाव लड़कर भी पहुंच गए । 
विगत सात वर्षो से केन्द्र में भाजपा सरकार काबिज है । पुराने अनुभवों को जानकर भी भाजपा सरकार इस परिपाटी से बच नहीं पाई । उल्टा प्रशासन का भाजपाई और संघीकरण कर बैठी। इस सरकार ने भी कई ऐसे निर्णय लिए हैं जो देखने में तो प्रशासनिक नज़र आते हैं पर हकीकत में राजनीति से प्रेरित रहे। इस दौर में भी कई अधिकारियों को पीड़ित प्रताड़ित किया गया है। जो अब सेवानिवृत्ति की कगार पर हैं । यह बात तय है कि आने वाले दिनों में ऐसे अधिकारी हालिया सरकार के निर्णयों में अपनाई गई प्रक्रिया को उजागर कर विवादास्पद बना सकते हैं । इसीलिए सरकार का हालिया निर्णय प्रशासनिक तौर पर तो उचित माना जा सकता है पर स्वतंत्रता की अभिव्यक्ति के लिहाज से अनुचित ।

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