नर्मदा में 11 हजार लीटर दूध बहाने पर सख्त हुआ NGT, सीहोर के धार्मिक आयोजन पर पर्यावरणीय अपराध का मामला

भोपाल और सीहोर के बीच बहने वाली मां नर्मदा सिर्फ एक नदी नहीं, करोड़ों लोगों की आस्था है। लोग यहां पूजा करते हैं, दीपदान करते हैं और अपनी मनोकामनाएं लेकर पहुंचते हैं। लेकिन अब यही आस्था एक बड़े पर्यावरणीय सवाल के घेरे में आ गई है। सीहोर जिले में धार्मिक आयोजन के दौरान नर्मदा नदी में 11 हजार लीटर दूध बहाने और 211 साड़ियों का विसर्जन करने का मामला राष्ट्रीय हरित अधिकरण यानी एनजीटी तक पहुंच गया है।

इस मामले ने पूरे मध्यप्रदेश में बहस छेड़ दी है। क्या धार्मिक आस्था के नाम पर नदी में इतनी बड़ी मात्रा में सामग्री बहाना सही है? क्या इससे नर्मदा का पानी दूषित हो रहा है? क्या जलीय जीवों को नुकसान पहुंच रहा है? इन्हीं सवालों के जवाब तलाशने के लिए अब केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड और मध्यप्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड को वैज्ञानिक जांच के आदेश दिए गए हैं। एनजीटी ने इस पूरे मामले को पर्यावरणीय अपराध मानते हुए गंभीर टिप्पणी की है।


सीहोर में नर्मदा नदी में दूध बहाने का पूरा मामला क्या है?

यह मामला सीहोर जिले की भैरूंदा तहसील के सतदेव और भैरूंदा गांव से जुड़ा हुआ है। यहां एक बड़े धार्मिक आयोजन का समापन हुआ था। आयोजन खत्म होने के बाद श्रद्धालुओं और आयोजकों ने नर्मदा नदी में करीब 11 हजार लीटर दूध अर्पित किया। इसके साथ ही 211 साड़ियों का भी नदी में विसर्जन किया गया।

स्थानीय लोगों ने इस घटना के वीडियो और तस्वीरें सोशल मीडिया पर साझा किए। मामला बढ़ने के बाद इसे लेकर एनजीटी में याचिका दायर की गई। याचिका में कहा गया कि इस तरह नदी में भारी मात्रा में जैविक सामग्री डालने से पानी प्रदूषित हो सकता है और नदी का पारिस्थितिकी तंत्र बिगड़ सकता है।

याचिकाकर्ताओं ने दावा किया कि दूध जैसी जैविक सामग्री पानी में जाकर ऑक्सीजन का स्तर कम करती है। इससे मछलियों और दूसरे जलीय जीवों के लिए खतरा पैदा होता है। साथ ही नदी किनारे की कृषि भूमि भी प्रभावित हो सकती है।

एनजीटी ने इसे पर्यावरणीय अपराध क्यों माना?

राष्ट्रीय हरित अधिकरण ने सुनवाई के दौरान साफ कहा कि नदियों को प्रदूषित करने वाली किसी भी गतिविधि को हल्के में नहीं लिया जा सकता। ट्रिब्यूनल ने माना कि पहली नजर में यह मामला पर्यावरणीय नुकसान से जुड़ा दिखाई देता है।

एनजीटी ने कहा कि भले ही अभी तक “दूध बहाने” को लेकर कोई अलग नियम या गाइडलाइन नहीं बनी हो, लेकिन जल (प्रदूषण निवारण और नियंत्रण) अधिनियम 1974 की धारा 24 साफ कहती है कि किसी भी नदी या जलस्रोत में ऐसी सामग्री नहीं डाली जा सकती जिससे पानी दूषित हो।

ट्रिब्यूनल ने यह भी माना कि दूध एक जैविक पदार्थ है। जब इतनी बड़ी मात्रा में दूध नदी में डाला जाता है तो पानी में बायोलॉजिकल ऑक्सीजन डिमांड यानी BOD बढ़ सकती है। इसका मतलब है कि पानी में मौजूद ऑक्सीजन कम हो सकती है, जिससे जलीय जीवों को सांस लेने में परेशानी होती है।

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