भुला दिए जाने का अधिकार: दिल्ली हाई कोर्ट का बड़ा फैसला, अब ऑनलाइन रिकॉर्ड से हटाई जा सकेगी निजी जानकारी

दिल्ली हाई कोर्ट ने सोमवार को एक ऐसे मुद्दे पर फैसला दिया है, जिसका असर आने वाले समय में लाखों इंटरनेट यूजर्स पर पड़ सकता है। अदालत ने "भुला दिए जाने के अधिकार" यानी Right to be Forgotten को भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत मिलने वाले निजता के अधिकार का अहम हिस्सा माना है। इस फैसले के बाद ऐसे लोगों को राहत मिल सकती है जिनकी पुरानी या निजी जानकारी इंटरनेट पर मौजूद होने से उनकी सामाजिक या पेशेवर जिंदगी प्रभावित हो रही है।

यह फैसला ऐसे समय में आया है जब डिजिटल दुनिया में किसी भी व्यक्ति की जानकारी सालों तक ऑनलाइन बनी रहती है और कई बार पुरानी घटनाएं वर्तमान जीवन पर भी असर डालती हैं। अदालत ने माना कि हर व्यक्ति को अपनी गरिमा और निजता की रक्षा का अधिकार है।

 Right to be Forgotten क्या है और क्यों है महत्वपूर्ण?

Right to be Forgotten का मतलब है कि किसी व्यक्ति को यह अधिकार मिले कि उसकी ऐसी व्यक्तिगत जानकारी, जो अब सार्वजनिक हित से जुड़ी नहीं है और जिससे उसकी प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंच रहा है, उसे इंटरनेट से हटाने या कम दिखाई देने योग्य बनाने की मांग की जा सके। यह अधिकार कई यूरोपीय देशों में पहले से लागू है और अब भारत में भी इस पर न्यायपालिका गंभीरता से विचार कर रही है।

दिल्ली हाई कोर्ट के अनुसार, इंटरनेट पर मौजूद हर जानकारी हमेशा सार्वजनिक रहना जरूरी नहीं है। कई मामलों में व्यक्ति किसी कानूनी विवाद, जांच या पुराने मुकदमे से बाहर निकल चुका होता है, लेकिन ऑनलाइन रिकॉर्ड उसकी पहचान से जुड़े रहते हैं। ऐसे में रोजगार, सामाजिक संबंध और व्यक्तिगत जीवन प्रभावित हो सकता है। अदालत ने कहा कि निजता का अधिकार केवल निजी जीवन तक सीमित नहीं है, बल्कि व्यक्ति की प्रतिष्ठा और सम्मान से भी जुड़ा हुआ है। इसलिए उचित परिस्थितियों में जानकारी को डीलिंक या डी-इंडेक्स करने की मांग पर विचार किया जा सकता है।

निजता का अधिकार और न्यायिक रिकॉर्ड के बीच संतुलन

हालांकि हाई कोर्ट ने इस अधिकार को मान्यता दी है, लेकिन साथ ही एक महत्वपूर्ण शर्त भी रखी है। अदालत ने कहा कि न्यायिक रिकॉर्ड की अखंडता और पारदर्शिता बनी रहनी चाहिए। इसका मतलब यह है कि किसी भी मामले में पूरी फाइल या अदालत के रिकॉर्ड को हटाया नहीं जाएगा, बल्कि जरूरत पड़ने पर व्यक्तिगत जानकारी को छिपाने या खोज परिणामों से हटाने जैसे विकल्पों पर विचार किया जा सकता है।

कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला डिजिटल युग में निजता की सुरक्षा को लेकर एक महत्वपूर्ण कदम है। आने वाले समय में ऐसे मामलों की संख्या बढ़ सकती है, जहां लोग अपनी पुरानी व्यक्तिगत जानकारी को इंटरनेट से हटाने की मांग करेंगे। वहीं अदालतों को हर मामले में यह तय करना होगा कि व्यक्ति की निजता ज्यादा महत्वपूर्ण है या सार्वजनिक हित।

दिल्ली हाई कोर्ट का यह फैसला भारत में डिजिटल अधिकारों और निजता की बहस को नई दिशा देने वाला माना जा रहा है। इससे यह संदेश भी गया है कि तकनीक के बढ़ते दौर में नागरिकों की गरिमा और व्यक्तिगत अधिकारों की सुरक्षा उतनी ही जरूरी है, जितनी सूचना तक सार्वजनिक पहुंच।

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