आखिर प्रभु राम कहां धर्म नहीं निभा पाए ?


वरिष्ठ पत्रकार शैलेन्द्र तिवारी की राम- दशरथ के अधर्म को तलाशती लंका
खबर नेशन / Khabar Nation
क्यों भगवान राम ने सबके बीच सीता का तिरस्कार कर दिया? क्या यह राम का अधर्म नहीं माना जाएगा? क्या राजा दशरथ ने अयोध्या की जनता से किए गए वादे को निभाने की बजाय भरत को सत्ता सौंपते हुए अधर्म नहीं किया ? इन सवालों के जबाव तलाशती कहानी है लंका  वरिष्ठ पत्रकार शैलेन्द्र तिवारी की । पूर्व में रावण एक अपराजित योद्धा लिखकर वे चर्चा में आ चुके हैं ।
शैलेन्द्र बताते हैं कि रावण को हम जीवन में खलनायक के तौर पर स्वीकारते हैं लेकिन रावण होना आसान नहीं है । ज्ञान, वैभव,कीर्ति,बल और बुद्धि की विलक्षण योग्यता के धनी योद्धा रावण से भगवान राम भी आसानी से नहीं जीत पाए थे । भगवान राम को भी छल का साथ मिला तब जाकर वे रावण को मार पाए थे । इसके बावजूद राम ने अपने छोटे भाई लक्ष्मण को रावण को अपना गुरु बनाने के लिए निर्देशित किया ।
धर्म क्या है, राजनीति क्या है और जीवन का सबसे बड़ा शत्रु कौन है ? एक शासक के लिए संपति के मायने क्या हैं ? 
सवाल ढ़ेर सारे हैं। महराज दशरथ ने कैकयी से तो वचन निभाया लेकिन अयोध्या की जनता से नहीं । क्या यह धर्म विरुद्ध नहीं था ? राम ने अपने पिता दशरथ का आग्रह टाला जा । क्या यह धर्म विरुद्ध है ? क्या बालि का छुपकर वध राम का धर्म था? अगर बालि ने अपने छोटे भाई की पत्नी जो बेटी समान होती है को रानिवास में रखकर अधर्म किया था तो भगवान राम ने बालि की पत्नी जो सुग्रीव की माता समान थी को सुग्रीव की रानी बनवाकर अधर्म नहीं किया ?
धर्म और अधर्म की महीन रेखा को रेखांकित करने का प्रयास है लंका लेकिन इसके पहले रावण एक अपराजित योद्धा जानना समझना जरूरी है ।

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