हर साल क्यों डूबता है असम? बारिश नहीं, बाढ़ प्रबंधन की नाकामी भी बड़ी वजह
असम। पूर्वोत्तर भारत का सबसे बड़ा राज्य असम एक बार फिर भीषण बाढ़ की चपेट में है। हर साल मानसून के दौरान यहां बाढ़ आती है, लेकिन इस बार भी वही सवाल सामने है कि आखिर यह त्रासदी हर वर्ष क्यों दोहराई जाती है। क्या इसकी वजह केवल भारी बारिश है या फिर दशकों से चल रहे बाढ़ नियंत्रण के दावों की भी जवाबदेही तय होनी चाहिए?
इस बार की बाढ़ ने राज्य के लाखों लोगों का जीवन प्रभावित किया है। शुरुआती दौर में 9 लाख से अधिक लोग बाढ़ से प्रभावित हुए। 25 जुलाई तक यह संख्या करीब 7 लाख रही और अब भी 3.32 लाख से ज्यादा लोग राहत एवं पुनर्वास पर निर्भर हैं। बाढ़ में अब तक 75 लोगों की जान जा चुकी है। हजारों घर क्षतिग्रस्त हो गए हैं, सैकड़ों गांव जलमग्न हैं और हजारों हेक्टेयर कृषि भूमि बर्बाद हो चुकी है।
IMD ने पहले ही जारी किया था अलर्ट
भारतीय मौसम विभाग (IMD) ने पहले ही भारी से अत्यधिक भारी बारिश की चेतावनी जारी कर दी थी। यानी संभावित खतरे की जानकारी पहले से उपलब्ध थी। इसके बावजूद सवाल उठ रहे हैं कि क्या प्रशासन ने संवेदनशील क्षेत्रों को समय रहते खाली कराया? क्या राहत एवं बचाव दल पूरी तरह तैयार थे? क्या बाढ़ सुरक्षा के लिए बनाए गए तटबंध पर्याप्त मजबूत थे?
हर साल बाढ़ नियंत्रण और तटबंधों की मरम्मत पर बड़ी राशि खर्च होने के बावजूद कई स्थानों पर तटबंध पहली ही तेज बारिश में क्षतिग्रस्त हो जाते हैं। ऐसे में बाढ़ का पानी तेजी से आबादी वाले इलाकों में पहुंच जाता है।
मुख्यमंत्री ने माना, तबाही थी कल्पना से परे
मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने इस बाढ़ को "कल्पना से परे" बताया है। केंद्र सरकार ने राहत एवं पुनर्वास के लिए सहायता का भरोसा दिया है और नुकसान का आकलन करने के लिए उच्चस्तरीय टीम भी भेजी गई है। हालांकि जिन परिवारों ने अपने घर, खेत और मवेशी खो दिए हैं, उनके लिए सबसे बड़ा सवाल यही है कि आखिर हर साल यही हालात क्यों बनते हैं।
असम में बाढ़ का लंबा इतिहास
असम में बाढ़ कोई नई समस्या नहीं है। पिछले 26 वर्षों में बाढ़ के कारण 2,200 से अधिक लोगों की मौत हो चुकी है। 2019 में करीब 52 लाख लोग बाढ़ से प्रभावित हुए थे। 2022 की भीषण बाढ़ में 54 लाख से ज्यादा लोग प्रभावित हुए और 200 से अधिक लोगों की जान गई। 2024 में भी लाखों लोग बाढ़ की चपेट में आए थे। यह आंकड़े बताते हैं कि असम में बाढ़ अब एक नियमित और गंभीर संकट बन चुकी है।
सिर्फ बारिश नहीं, कई कारण हैं जिम्मेदार
विशेषज्ञों का मानना है कि केवल भारी वर्षा को इस तबाही के लिए जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता। ब्रह्मपुत्र और उसकी सहायक नदियों में लगातार गाद जमा होना, नदी कटाव, कमजोर तटबंध, बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों में अतिक्रमण और जलवायु परिवर्तन जैसे कई कारण मिलकर हर साल स्थिति को और गंभीर बना देते हैं।
यदि हर वर्ष बाढ़ की आशंका पहले से रहती है, तो वैज्ञानिक नदी प्रबंधन, तटबंधों के आधुनिकीकरण, समय पर चेतावनी प्रणाली और दीर्घकालिक बाढ़ नियंत्रण योजना पर अपेक्षित स्तर पर काम क्यों नहीं हो पाया, यह बड़ा सवाल बना हुआ है।
ग्राउंड जीरो पर तबाही का मंजर
बाढ़ प्रभावित इलाकों की तस्वीरें बेहद दर्दनाक हैं। कई गांव पूरी तरह पानी में डूब गए हैं। लोग घरों की छतों और ऊंचे स्थानों पर शरण लेने को मजबूर हैं। किसानों की महीनों की मेहनत पानी में बह गई है। राहत शिविरों में हजारों लोग रह रहे हैं, लेकिन उनके मन में डर बना हुआ है कि अगली बारिश में फिर यही स्थिति न बन जाए।
स्थायी समाधान की जरूरत
विशेषज्ञों का मानना है कि केवल राहत पैकेज और मुआवजा इस समस्या का समाधान नहीं हो सकते। जरूरत ऐसी दीर्घकालिक रणनीति की है जिसमें नदी प्रबंधन, मजबूत तटबंध, जल निकासी व्यवस्था, अतिक्रमण पर नियंत्रण, आधुनिक पूर्व चेतावनी प्रणाली और जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को ध्यान में रखते हुए योजनाएं बनाई जाएं।
असम की बाढ़ केवल एक प्राकृतिक आपदा नहीं, बल्कि देश की बाढ़ प्रबंधन व्यवस्था की भी बड़ी परीक्षा है। जब तक हर साल उठने वाले इन सवालों के ठोस और स्थायी जवाब नहीं मिलते, तब तक ब्रह्मपुत्र का बढ़ता जलस्तर केवल गांवों और खेतों को ही नहीं, बल्कि व्यवस्था के दावों को भी चुनौती देता रहेगा।
हर साल क्यों डूबता है असम? बारिश नहीं, बाढ़ प्रबंधन की नाकामी भी बड़ी वजह