18 दिन का अनशन… गिरती सेहत… लेकिन सत्ता अब भी मौन

जंतर-मंतर पर 28 जून से आमरण अनशन पर बैठे शिक्षा सुधार और पारदर्शिता की मांग उठाने वाले सोनम वांगचुक की तबीयत लगातार बिगड़ रही है। उनका वजन 8 किलो से अधिक घटने और स्वास्थ्य खराब होने की जानकारी सामने आई है, लेकिन अब तक केंद्र सरकार की ओर से न तो कोई औपचारिक वार्ता हुई है और न ही कोई वरिष्ठ प्रतिनिधि उनसे मिलने पहुंचा।

 देश की शिक्षा व्यवस्था, परीक्षा प्रणाली में जवाबदेही और केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग को लेकर सोनम वांगचुक 28 जून से जंतर-मंतर पर भूख हड़ताल पर बैठे हैं। आंदोलन 18वें दिन में पहुंच चुका है, लेकिन सरकार की ओर से उनकी प्रमुख मांगों पर कोई सार्वजनिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। 

वांगचुक की बिगड़ती सेहत के बीच विपक्ष की सक्रियता भी सीमित दिखाई दे रही है। कुछ विपक्षी नेताओं ने समर्थन जताया और अनशन समाप्त करने की अपील की, लेकिन यह मुद्दा अभी तक व्यापक राजनीतिक अभियान का रूप नहीं ले सका।देश की प्रमुख विपक्षी दल कांग्रेस भी इस मामले से दूरी बनाए हुए है !

2011 में अन्ना हजारे के आंदोलन

सबसे बड़ा सवाल केंद्र सरकार की कार्यप्रणाली पर उठ रहा है। लोकतंत्र में यदि कोई नागरिक शांतिपूर्ण और अहिंसक तरीके से अपनी मांग रखता है, तो क्या सरकार का दायित्व केवल इंतजार करना है, या संवाद स्थापित करना भी उसकी जिम्मेदारी है? 2011 में अन्ना हजारे के आंदोलन के दौरान तत्कालीन यूपीए सरकार ने अनशन के शुरुआती दिनों में ही बातचीत की प्रक्रिया शुरू कर दी थी। मौजूदा मामले में 17 दिन बीत जाने के बाद भी एनडीए सरकार की ओर से कोई औपचारिक वार्ता सार्वजनिक रूप से सामने नहीं आई है।

सरकारों के रवैये

दोनों परिस्थितियां अलग हो सकती हैं, लेकिन संवाद को लेकर सरकारों के रवैये की तुलना अब राजनीतिक बहस का विषय बन गई है ! इसी बीच केंद्रीय मंत्री राजनाथ सिंह का पुराना बयान वायरल हो रहा है जहाँ वो कहते है ये NDA गवर्नमेंट है यहाँ इस्तीफ़े नहीं होते !इस पूरे घटनाक्रम ने शिक्षा मंत्रालय पर भी सवाल खड़े किए हैं। परीक्षा अनियमितताओं को लेकर देशभर में उठे विरोध के बीच यदि एक प्रमुख शिक्षा सुधारक लगातार आमरण अनशन पर है, तो क्या मंत्रालय को कम से कम संवाद की पहल नहीं करनी चाहिए?

 

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