मेधा पाटकर, नर्मदा बचाओं आन्दोलन बधाई।
बड़वानी में नर्मदा बचाओं आन्दोलन की नेत्री सुश्री मेधा पाटकर जी के नेतृत्व में नर्मदा चुनौती अनिश्चित कालीन सत्याग्रह का समापन 02 सितम्बर 2019 को हो गया, सुश्री मेधा पाटकर, नर्मदा बचाओं आन्दोलन तथा देश भर के क्रांतिकारी साथियों को बहुत बहुत बधाई।
खबर नेशन /Khabar Nation
- एड. आराधना भार्गव
नर्मदा बचाओं आनदोलन का सत्याग्रह 192 गांव और 1 नगर को बिना पुनर्वास डूबाने की केन्द्र और गुजरात सरकार के विरोध में किया गया था। आज जब कि सरदार सरोवर बाँध से प्रभावित 192 गांव और एक नगर में 32,000 परिवार निवासरत है ऐसी स्थिति में बाँध में 138, 68 मीटर पानी भरने से 192 गांव और एक नगर डूब प्रभावित हो रहे है। बाँध में 135 मीटर पानी भरने से कई गांव जलमगन हो गए है, हजारो हेक्टेयर जमीन डूब गई है जिसका भी सर्वोच्च न्यायालय के फैसले के अनुसार 60 लाख रूपये मुआवजे की राशि मिलना बाकी है, कई घरों का भू-अर्जन होना बाकी है ऐसी स्थिति में लोगों को बिना पुनर्वास डूबाया जा रहा है। पिछले 15 वर्ष में मध्यप्रदेश में भाजपा की सरकार थी सरकार द्वारा 2008 में फर्जी शून्य बेलेन्स के शपथपत्र न्यायालय के समक्ष भाजपा की सरकार देती रही। नर्मदा बचाओं आन्दोलन का सर्वे बतलाता है कि आज भी नर्मदा घाटी में लगभग 30,000 परिवार निवासरत है जिनका अभी तक पुनर्वास नही हुआ है। नर्मदा ट्रिब्यनल और सर्वोच्च न्यायालय के फैसलों के तहत डूब के पहले सम्पूर्ण पुनर्वास हो, यह सुनिश्चित करने के लिए सरदार सरोवर बाँध के गेट खुलवाने का आग्रह करते हुए नर्मदा चुनौती अनिश्चित कालीन सत्याग्रह किया गया था। किन्तु अफसोस की बात है कि मध्यप्रदेश में कांग्रेस की सरकार ने सरदार सरोवर बाँध के गेट तक नही खुलवाए।
सरकारों को यह ध्यान रखना चाहिए कि आन्दोलनकारी दुश्मन नही होते आन्दोलन से लोकतंत्र मजबूत होता है। तथा देश की जनता अपनी आवाज को सरकार तक पहुँचाने के लिए आन्दोलन सेतु का काम करते है। परन्तु वर्तमान परिवेश में सरकारों का रूख आन्दोनल कारियों के लिए दुश्मन से भी बड़ा क्रूर व्यवाहार करते दिखाई दे रहा है। सुश्री मेधा पाटकर जी अपनी जान जोखिम में डालकर 9 दिन से उपवास पर बैठी रही उनका स्वास्थ्य अत्यधिक खराब होने लगा लगातार उल्टियाँ होने लगी, शरीर मे ंकीटोन बढ़ने लगा वे मूर्छा की हालत में पहुँच गई। देश के प्रधानमंत्री दुनिया में घूमते है उनके पास अपने ही देश के नागरिकों की पीढ़ा, दर्द माननीय उच्चतम न्यायालय के फैसने को देखने का वक्त नही है, उसी तरह प्रदेश के मुख्यमंत्री चुनाव के पूर्व नर्मदा बचाओं आन्दोलन के कार्यकर्ताओं से मुलाकात करते थे किन्तु प्रदेश के मुख्यमंत्री बनने के पश्चात् कमलनाथ जी ने भी सुश्रीी मेधापाटकर एवं सरदार सरोवर बाँध से विस्थापित परिवारों से मिलना भी उचित नही समझा यह लोकतंत्र के लिए अत्यंत दुःखद बात है।
नर्मदा बचाओं आन्दोलन की ही देन नया भू-अर्जन कानून है। अंग्रेजों द्वारा भारत के किसानों की जमीनों को हड़प्पने के लिए भू-अर्जन कानून बनाया था। बिना किसान की अनुमति के सरकार जोर जबरदस्ती से किसानों की जमीन हड़प्प लेती थी। नया भू-अर्जन कानून अब सरकार 80 प्रतिशत किसानों की सहमति होने पर ही किसान की जमीन अधिग्रहित कर सकती है। नया भू-अर्जन कानून कांग्रेस की सरकार के कार्यकाल में लाया गया, परन्तु जिन प्रदेशों में कांग्रेस की सरकार है उन प्रदेशों में भी नए भू-अर्जन कानून को लागू कराने का प्रयास नही किया जा रहा है। किसानों के हक में सम्पूर्ण देश में संघर्ष कर रहे जन आन्दोलन के राष्ट्रीय समन्वय, नर्मदा बचाओं आन्दोलन तथा मेधा पाटकरजी के संघर्ष को सलाम्। ‘‘लड़ेगे जीतेंगे, नही किसी से भीख मांगते हम अपना अधिकार जानते’’ के साथ संघर्ष के लिए जोरदार जिन्दाबाद!