अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस 2026: हजारों साल पुरानी भारतीय विरासत, जिसने पूरी दुनिया को जीने का नया तरीका सिखाया
आज योग दुनिया के करोड़ों लोगों की दिनचर्या का हिस्सा बन चुका है। न्यूयॉर्क के पार्कों से लेकर लंदन के स्टूडियो तक, टोक्यो के कॉर्पोरेट दफ्तरों से लेकर दिल्ली के खुले मैदानों तक लोग योग करते नजर आते हैं। लेकिन योग की यह वैश्विक पहचान एक दिन में नहीं बनी। इसके पीछे हजारों वर्षों का इतिहास, ऋषियों की तपस्या, गुरुओं का ज्ञान और भारतीय संस्कृति की गहरी आध्यात्मिक परंपरा छिपी हुई है।
क्या है योग का वास्तविक अर्थ?
योग शब्द संस्कृत की ‘युज’ धातु से बना है, जिसका अर्थ है , जोड़ना। लेकिन यह जोड़ना केवल शरीर को लचीला बनाने तक सीमित नहीं है। योग शरीर को मन से, मन को आत्मा से और आत्मा को परम चेतना से जोड़ने की प्रक्रिया है।
भारतीय दर्शन में योग को केवल व्यायाम नहीं, बल्कि जीवन जीने का विज्ञान माना गया है। यह सिखाता है कि बाहरी दुनिया को जीतने से पहले अपने भीतर के भय, क्रोध, तनाव और अहंकार पर विजय पाना आवश्यक है।
सिंधु सभ्यता से शुरू होती है योग की कहानी
योग का इतिहास किसी एक व्यक्ति या एक पुस्तक से शुरू नहीं होता। इसके प्रमाण लगभग 2700 ईसा पूर्व की सिंधु-सरस्वती सभ्यता में मिलते हैं। पुरातत्वविदों को ऐसी कई मुहरें और मूर्तियां मिली हैं, जिनमें लोग ध्यान मुद्रा में बैठे दिखाई देते हैं।
हालांकि उस समय का लिखित इतिहास उपलब्ध नहीं है, लेकिन यह स्पष्ट संकेत मिलता है कि ध्यान और योग जैसी साधनाओं का अभ्यास भारतीय सभ्यता के शुरुआती दौर में भी किया जाता था।
वेदों और उपनिषदों में योग का विस्तार
योग शब्द का पहला उल्लेख ऋग्वेद में मिलता है। वैदिक काल में योग केवल शारीरिक क्रिया नहीं था, बल्कि आत्म-अनुशासन, तप, ध्यान और चेतना के विकास का माध्यम माना जाता था।
ऋषि-मुनि जंगलों और आश्रमों में रहकर जीवन के गहरे रहस्यों को समझने का प्रयास करते थे। उनका मानना था कि मनुष्य का वास्तविक विकास बाहरी उपलब्धियों से नहीं, बल्कि आंतरिक जागृति से होता है।
बाद में उपनिषदों ने इस विचार को और विस्तार दिया। उन्होंने बताया कि परम सत्य कहीं बाहर नहीं, बल्कि प्रत्येक व्यक्ति के भीतर मौजूद है। यहीं से कर्मयोग और ज्ञानयोग जैसी अवधारणाओं का विकास हुआ। कर्मयोग ने निस्वार्थ कर्म का संदेश दिया, जबकि ज्ञानयोग ने आत्मचिंतन और सत्य की खोज को जीवन का उद्देश्य बताया।
महर्षि पतंजलि ने दिया योग को वैज्ञानिक स्वरूप
योग के इतिहास में सबसे महत्वपूर्ण मोड़ तब आया, जब महर्षि पतंजलि ने योगसूत्रों की रचना की। उन्होंने बिखरे हुए योग ज्ञान को व्यवस्थित रूप दिया और अष्टांग योग की अवधारणा प्रस्तुत की।
यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि इन आठ चरणों ने योग को केवल साधना नहीं, बल्कि एक संपूर्ण जीवन पद्धति बना दिया।
इसी कारण महर्षि पतंजलि को आज भी योग दर्शन का सबसे बड़ा आचार्य माना जाता है।
हठयोग ने योग को जन-जन तक पहुंचाया
मध्यकाल में योग की नई धाराओं का विकास हुआ। योगाचार्यों ने महसूस किया कि शरीर को साधे बिना मन और आत्मा को साधना कठिन है। इसी सोच से हठयोग का जन्म हुआ।
आसन, प्राणायाम और शारीरिक अनुशासन के माध्यम से शरीर को मजबूत और मन को स्थिर बनाने वाली यह परंपरा धीरे-धीरे सबसे लोकप्रिय योग पद्धति बन गई। आज दुनिया में जो योग सबसे अधिक प्रचलित है, उसकी जड़ें हठयोग में ही मिलती हैं।
भारत से दुनिया तक कैसे पहुंचा योग?
उन्नीसवीं और बीसवीं शताब्दी में कई महान संतों और योगाचार्यों ने योग को वैश्विक पहचान दिलाई। स्वामी विवेकानंद ने 1893 में शिकागो की विश्व धर्म संसद में भारतीय अध्यात्म और योग के विचारों को दुनिया के सामने रखा।
इसके बाद स्वामी शिवानंद, परमहंस योगानंद, बी.के.एस. अयंगर और टी. कृष्णमाचार्य जैसे योगाचार्यों ने योग को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर लोकप्रिय बनाया। धीरे-धीरे पश्चिमी देशों ने योग को अपनाया और यह एक वैश्विक आंदोलन बन गया।
कैसे शुरू हुआ अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस?
योग की वैश्विक स्वीकार्यता को नई ऊंचाई तब मिली, जब 27 सितंबर 2014 को संयुक्त राष्ट्र महासभा में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस मनाने का प्रस्ताव रखा। उन्होंने कहा था कि योग केवल व्यायाम नहीं, बल्कि मनुष्य और प्रकृति के बीच सामंजस्य स्थापित करने का माध्यम है। 11 दिसंबर 2014 को संयुक्त राष्ट्र के 177 देशों ने इस प्रस्ताव का समर्थन किया और रिकॉर्ड समय में इसे मंजूरी मिल गई। इसके बाद 21 जून 2015 को पूरी दुनिया ने पहली बार अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस मनाया। तब से हर वर्ष 21 जून को विश्वभर में करोड़ों लोग योग के माध्यम से स्वास्थ्य और संतुलन का संदेश देते हैं।
अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस 2026: हजारों साल पुरानी भारतीय विरासत, जिसने पूरी दुनिया को जीने का नया तरीका सिखाया