कृषि भूमि से बेदखली की कार्यवाही पर 4 माह से न्याय मिलने का इंतज़ार कर रहे हैं धरमपुरी के गरीब किसान
राजस्व विभाग ने गरीब किसानों को बिना सूचना दिये कर दिया नापजोख
अमर नोरिया / खबर नेशन / Khabar Nation
नरसिंहपुर - एक ओर जहां प्रदेश भर में वनभूमि पर काबिज लोगों को वनाधिकार पट्टे दिये जाने का अभियान चल रहा है उसके उलट नरसिंहपुर जिले की करेली तहसील के धरमपुरी गांव में वनविभाग और राजस्व विभाग ने 12 परिवारों को जो कि लगभग 40-45 सालों से शासन द्वारा कृषि हेतु मिली पट्टे की भूमि पर कृषि कर अपने परिवार का भरण पोषण कर रहे थे उनकी कृषि भूमि पर वन विभाग का कब्जा बताकर तार फेंसिंग कर दी गई है । मामला करेली तहसील के अंतर्गत धरमपुरी का है जिसमें की शासन द्वारा गरीब भूमिहीनों को वर्ष 1972 -73 मे कृषि कार्य हेतु पट्टे प्रदान किये गये थे, कृषि भूमि के पट्टे के मामले में मार्च 2020 के महीने में वन विभाग और राजस्व विभाग के अधिकारियों और कर्मचारियों के द्वारा पट्टेधारियों जो कि वर्तमान में राजस्व रिकार्ड में बतौर भूस्वामी के रूप में कृषि भूमि पर काबिज हैं उनको बगैर किसी पूर्व सूचना के ज़मीन का नापजोख कर जो विवाद बना हुआ है वह 4 माह बाद भी अभी भी किसी निर्णय पर नहीं पहुंचा है । वनविभाग द्वारा गरीबों की कृषि भूमि पर जबरन कब्जा किये जाने के विरोध में ग्रामीणजनों ने कलेक्टर नरसिंहपुर को 10 जून 2020 को एक ज्ञापन सौंपकर कृषि भूमि से बेदखल करने की कार्यवाही पर रोक लगाये जाने की मांग की थी उसके बाद वनविभाग द्वारा गरीब पट्टेधारियों की कृषि भूमि पर जबरन तार फेंसिंग का कार्य जारी रखने को लेकर उक्त पट्टेधारियों ने 25 जून से अनिश्चितकालीन धरने पर बैठ गये थे तब 2 जुलाई को धरना स्थल पर पहुंचे तहसीलदार करेली के द्वारा वन विभाग के द्वारा किये जा रहे कार्य को रुकवाने और 15 दिवस में उनके जमीन से सम्बन्धी विवाद को लेकर दिये गये जांच के आश्वासन पर सहमत होकर प्रशासन से न्याय की उम्मीद लगा चुके उन सभी ने अपना धरना स्थगित कर दिया था । महत्वपूर्ण बात यह है कि धरमपुरी गांव के इस मामले में राजस्व रिकार्ड के अनुसार कई पेंच हैं जिनका निराकरण किये बिना इस विवाद का उचित हल नहीं निकल सकता है । वनविभाग के अनुसार उसकी वनभूमि के जो खसरे नम्बर 1,2,3,4,5,6,7,9,46,47,48,49,50,51,54, व 61 म.प्र.राजपत्र में 1984 में प्रकाशित किये जाकर वनभूमि घोषित की गई है उक्त भूमि से लगी राजस्व भूमि इन पट्टेदारों को 1972-73 से खसरे के बटांकन के अनुसार ही पट्टे पर प्रदान की गई थी जो कि हल्के वल्द रामप्रसाद खसरा नम्बर 2/2,भुजबल वल्द दलीप खसरा नम्बर 7/2,नर्मदा प्रसाद वल्द परमू खसरा नम्बर 7/3,बड़े भाई वल्द नन्हई खसरा न.9/3, मिहीलाल वल्द खुमान खसरा न.9/4,गनेश वल्द इमरत खसरा न.9/5, रामसेवक वल्द खुमान खसरा न. 9/6,बड़े भाई वल्द नन्हई खसरा न.10,मानसिंह वल्द जयराम खसरा न.61/3,देवीप्रसाद वल्द नन्हेवीर खसरा न.61/4,हुलकर वल्द छिदामी खसरा न.61/5,अन्नीलाल वल्द सुखराम खसरा न.61/6 अन्य यह सभी पट्टेदार वर्ष 2003-04 तक राजस्व रिकॉर्ड में बतौर भू स्वामी के दर्ज थे । वर्ष 2004 -05 से इनमें से कुछ लोगों के खसरे नम्बर बदल दिये गये तो कुछ लोग जिसमें की देवी सिंह वल्द नन्हेवीर जिनका खसरा न. 61/4 जो 1972 में था वह आज 2020-21 में भी 61/4 ही है और राजस्व रिकार्ड में यह आज भी भू स्वामी हैं और अपनी कृषि भूमि पर काबिज हैं किंतु उस भूमि पर राजस्व विभाग के नापजोख के बाद वनविभाग अपना दावा बता कर तार फेसिंग करवा चुका है । इस भूमि से ही लगी मानसिंह वल्द जयराम खसरा नम्बर 61/3 की भूमि है जिसपर वह काबिज हैं किंतु राजस्व के रिकार्ड में उनका नाम गायब है, तो इनसे ही लगी भूमि हुलकर वल्द छिदामी खसरा नम्बर 61/5 है उसका खसरा नम्बर बदलकर खसरा नम्बर 72 कर दिया गया है, वह वर्तमान में अपनी खसरा नम्बर 61/5 भूमि पर ही काबिज हैं तो खसरा नम्बर 61/6 अन्नीलाल वल्द सुखराम के नाम पट्टे पर 1972-73 में मिली थी उनका नाम भी 2004-05 से रिकार्ड से गायब है जिसपर भी वनविभाग अपना दावा जता रहा है । महत्वपूर्ण बात यह कि इन खसरा नम्बरो का वनविभाग की भूमि के खसरा नम्बरों में भी जिक्र या उल्लेख नहीं है । भुजबल वल्द दलीप खसरा नम्बर 7/2 इनका नाम राजस्व रिकार्ड में गायब है जबकि इनके साथ लगी भूमि नर्मदा प्रसाद वल्द परमू खसरा नम्बर 7/3 जिस पर आज भी वह बतौर भू स्वामी काबिज हैं 1972 से लेकर 2020-21 तक राजस्व रिकार्ड में दर्ज है किंतु यह भूमि भी वनविभाग अपनी बताकर तारफेंसिंग कर चुका है जबकि वनविभाग की भूमि में खसरा नम्बर 7/3 शामिल ही नहीं है । खसरा नम्बर 2/2 जो हल्के वल्द रामप्रसाद के नाम था वह वर्तमान में राजस्व रिकार्ड में खसरा नम्बर 67 बता रहा है किंतु उक्त पट्टेदार/भू स्वामी खसरा नम्बर 2/2 में ही काबिज हैं जिस भूमि को भी वनविभाग अपनी खसरे की सूची में शामिल न होने पर अपनी बता रहा है फिलहाल 15 दिन की समयसीमा पूर्ण होने के बाद लगभग 1 माह से अधिक का समय बीत गया है किंतु इस मामले के जो पेंच हैं वह कब तक सुलझेंगे ....इसका इंतजार वह सभी गरीब बेसब्री से कर रहे हैं जिन्होंने लगभग 40-45 साल उस बंजर भूमि को अपनी मेहनत से खेती करते हुए उपजाऊ बनाकर अपने परिवारों का अब तक पालन पोषण करते आ रहे हैं ...!
ऐसे में महत्वपूर्ण बात यह कि जब धरमपुरी गांव के पटवारी हल्का नम्बर 7 के तहत वनविभाग की भूमि के जो खसरा नम्बर 25 जुलाई 1984 के मध्यप्रदेश के गजट नोटिफिकेशन में जारी किये गये थे उस सूची में इन गरीबों के पट्टे की भूमि के खसरा नम्बर जो थे वह उस गजट नोटिफिकेशन में प्रकाशित न होने के बाद भी राजस्व विभाग और वनविभाग ने इन गरीबों की भूमि पर अपना कब्जा कैसे बता दिया और राजस्व विभाग के पास समस्त राजस्व रिकार्ड जिसमें यह लोग वर्तमान में बतौर भू स्वामी काबिज हैं उसे बिना इन्हें जानकारी नोटिस या सूचना दिये कैसे नापजोख कर दिया । वहीं इस संबंध में तहसीलदार करेली रमेश कुमार मेहरा से जानकारी ली तो उन्होंने इस मामले की वन विभाग से कागजात मांगकर जांच किये जाने की बात कही है ।