सिंधिया शो पीस बनकर न रह जाएं
भाजपा के पैमाने पर खरे कब उतरेंगे
खबर नेशन/Khabar Nation
मध्यप्रदेश नहीं देश के कद्दावर राजनेताओं में शुमार ज्योतिरादित्य सिंधिया के शो पीस बनते जाने का खतरा मंडराता जा रहा है । राजनैतिक हलकों में सवाल खड़ा होने लगा है कि आखिर सिंधिया भारतीय जनता पार्टी के आला नेताओं की नज़र में खरे कब उतरेंगे ?
मध्यप्रदेश कांग्रेस में उपेक्षा से आहत , व्यथित आक्रोशित ज्योतिरादित्य सिंधिया ने मार्च 2020 में कांग्रेस को अलविदा कह दिया । सिंधिया का कांग्रेस को छोड़ना अपशगुन साबित हुआ । सिंधिया के साथ बाईस कांग्रेस विधायकों ने पार्टी छोड़ी और पंद्रह महीने पुरानी सरकार अल्पमत में आ गई । संख्या बल के आधार पर भाजपा की सरकार बनी और सिंधिया के चौदह समर्थकों को भाजपा सरकार में मंत्री बनाया गया । सिंधिया सिर्फ राज्यसभा सदस्य ही बन पाए हैं।
सिंधिया राष्ट्रीय स्तर के नेता हैं। सिंधिया को योग्यता के अनुसार ना तो अभी तक मंत्री बनाया गया है और ना ही हाल में घोषित हुई भाजपा की राष्ट्रीय कार्यकारिणी में जगह दी गई है ।
अगर हम सिंधिया की हालिया परिस्थितियों को देखते हुए कांग्रेस में रहने के दौरान सिंधिया के कद का आकलन करें तो बकौल राहुल गांधी के वे पारिवारिक मित्रों में शामिल थे। कांग्रेस सरकार में मंत्री और संगठन में कद्दावर नेता के तौर पर स्थापित थे। लोकसभा चुनाव में उन्हें प्रियंका गांधी के बराबर जवाबदारी सौंपी गई थी । कद के हिसाब से सिंधिया कांग्रेस में टॉप टेन नेताओं में शुमार होते रहे ।
बात भाजपा की सिंधिया के शामिल होने के बाद उन्हें राष्ट्रीय स्तर के टॉप टेन नेताओं में शामिल होने के लिए काफ़ी लंबा दौड़ना पड़ेगा । मध्यप्रदेश में ही आज उन्हें भले मुख्यमंत्री शिवराज के बराबर बताया जा रहा हो पर शिवराज सिंह चौहान , नरेन्द्र सिंह तोमर, थावरचंद गेहलोत,उमा भारती, प्रहलाद पटेल,प्रभात झा,फग्गन सिंह कुलस्ते के बीच अपनी योग्यता को साबित करना पड़ेगा। खुद ग्वालियर में ही भाजपा के तीन वरिष्ठ नेताओं के बीच अपनी योग्यता को अव्वल नंबर पर लाना होगा । योग्यता का पैमाना मध्यप्रदेश की 28 सीटों पर होने जा रहे विधानसभा उपचुनाव हैं। भारतीय जनता पार्टी विधानसभा उपचुनाव में सर्वे के आधार पर सिंधिया के छह समर्थकों के टिकट काटना चाहती थी और सिंधिया की सहमति से ही उनके अन्य समर्थकों को टिकट देने का मन बनाए हुए थी लेकिन सारे समर्थकों को रिपीट कर चाबी सिंधिया के हाथों में सौंप दी है। चम्बल ग्वालियर के राजनैतिक एवं प्रशासनिक फैसले भी सिंधिया के अनुरूप लिए जा रहे हैं । फैसले अनुरूप आते ना देख सिंधिया संघ मुख्यालय में भी शिकायत कर हस्तक्षेप की गुहार लगा रहे हैं। जिसे भाजपा के आला नेता हैरत से देख रहे हैं। अब इन प्रत्याशियों की जीत-हार पर सिंधिया का भविष्य निर्भर हो गया है । भाजपा को संख्या बल के हिसाब से सत्ता बचाए रखने के लिए मात्र नौ विधायकों की जरूरत है और सिंधिया को योग्यता बनाए रखने के लिए कम से कम 22 प्रत्याशियों की जीत जरूरी है । ये वे प्रत्याशी हैं जो सिंधिया के साथ कांग्रेस छोड़कर गये थे । राजनैतिक माहौल जबरदस्त बना हुआ है। सरकारी तंत्र और भाजपा के चुनाव लड़ने की रणनीति जहां भाजपा के पक्ष में आकलन कर रहा है तो बुरी तरह टूटकर बिखरी कांग्रेस के पक्ष में मिल रहे जनसमर्थन को आश्चर्य के साथ देख रहा है। भाजपा के नेता सत्ता बचाए रखने के गणित को लेकर आश्वस्त हैं और अपने तुरुप के इक्के के तौर पर शिवराज सिंह चौहान को स्थापित करें जा रहे हैं। भाजपा के रणनीतिकार संभावित नुकसान को लेकर आकलन करने तैयार नहीं है। जो बार बार इशारा कर रहा है कि सरकार बची रही तो शिवराज की वजह से और अपेक्षानुरूप परिणाम की वजह सिंधिया ही माने जाएंगे।
सिंधिया के इन हालातों को लेकर ज्योतिरादित्य सिंधिया के खासुलखास एवं मोटीवेशनल गुरु के तौर पर स्थापित होते जा रहे भाजपा मीडिया पेनलिस्ट पंकज चतुर्वेदी का कहना है कि सिंधिया भाजपा में कार्यकर्ताओं के मान सम्मान के लिए शामिल हुए हैं । सिंधिया किसी भी पद के लिए राजनीति नहीं करते हैं और सिंधिया भाजपा की रीतियों नीतियों के अनुसार काम कर रहे हैं।