समान नागरिक संहिता से हिजाब विवाद कैसे सुलझेगा
सुमंत विद्वांस
जब से कर्नाटक में हिजाब वाला विवाद शुरू किया गया है, तभी से इधर वाले कई लोग भी यह बता रहे हैं कि समान नागरिक संहिता ही ऐसे झमेलों को खत्म कर सकती है।
लेकिन मुझे अभी तक समझ नहीं आया है कि हिजाब का समान नागरिक संहिता से क्या संबंध है। समान नागरिक संहिता हिजाब जैसे विषयों का निराकरण कैसे कर देगी?
जहां तक मैं जानता हूं, समान नागरिक संहिता से विवाह, तलाक, गुजारा भत्ता, संपत्ति में बेटों और बेटियों के समान अधिकार आदि तय होंगे और देश के हर नागरिक पर समान रूप से लागू होंगे, चाहे उसका धर्म, जाति, मजहब या संप्रदाय कोई भी हो।
अभी ये कानून धर्म या संप्रदाय के आधार पर भेदभाव करते हैं, जो कि संविधान में प्रदत्त समानता के अधिकार का उल्लंघन है। इसलिए संविधान में यह निर्देश दिया गया है कि सरकार समानता का कानून लागू करे।
लेकिन समान नागरिक संहिता यह तो नहीं बताएगी कि कौन क्या पहने और कैसे पहने। समान नागरिक संहिता यह नहीं बताएगी कि किसी स्कूल, कॉलेज का गणवेश कैसा हो। समान नागरिक संहिता यह नहीं बताएगी कि कौन किसकी उपासना कैसे करे।
अगर उसमें ये सब नहीं रहने वाला है, तो हिजाब की जिद का मामला समान नागरिक संहिता से कैसे सुलझेगा?
किसी को अगर लगता है कि समान नागरिक संहिता में ही सब धार्मिक और सांप्रदायिक विषय भी सुलझाए जाने चाहिए, तो वे कृपया यह भी समझा दें कि अगर सरकार यह तय करने लगे कि आपको तिलक लगाने या मंगलसूत्र पहनने की अनुमति हो या न हो, आरती कर सकते हैं या नहीं, घंटी या शंख बजाने की इजाजत हो या नहीं, तो क्या आप उसे स्वीकार करेंगे?
ज्ञानी और बुद्धिमान समझे जाने वाले या जबरन खुद को ज्ञानी और बुद्धिमान कहकर दूसरों पर थोपने वाले कई लोगों से मैंने यह पूछा कि समान नागरिक संहिता से हिजाब का क्या संबंध है? लेकिन अभी तक किसी ने भी नहीं बताया है, इसलिए मैं आपसे भी पूछ रहा हूं।
यदि आपको मालूम हो, तो कृपया मुझे भी समझा दीजिए। अन्यथा मेरा सुझाव है कि समान नागरिक संहिता जिस विषय से संबंधित है, कृपया उसे वहीं तक रहने दीजिए। कानून आपराधिक मामलों के लिए बनाए जाने चाहिए, सामाजिक विषयों के लिए नहीं।
जो मुद्दा केवल उप्र चुनाव में धांधली करने के इरादे से उछाला गया है, उसे अनावश्यक रूप से किसी और महत्वपूर्ण विषय से जोड़ने में मुझे समझदारी कम और खतरा अधिक दिखाई पड़ रहा है क्योंकि यह विवादित विषय तो 7 मार्च को ठंडा हो जाएगा और जिन्हें इसके कारण अचानक समान नागरिक संहिता याद आ गई है, वे लोग भी अगले दिन से इस पर चुप हो जाएंगे, लेकिन उसके कारण समान नागरिक संहिता का बड़ा विषय भी नए विवादों में उलझकर और आगे टल जाएगा।
इस पक्ष वालों को अभी भी बहुत कुछ सीखने की आवश्यकता है। सादर,
सुमंत विद्वांस जी की वॉल से सप्रेम,