बेखौफ अफसर ,मदमस्त राजनेता


2 साल से अवैध वसूली कर रही है स्मार्ट चिप कंपनी परिवहन विभाग में 
लोकायुक्त शिकायत के बाद भी धड़ल्ले से कामकाज जारी सरकारें बदल गई स्मार्ट चिप कंपनी बरकरार
120 करोड़ का घालमेल
खबर नेशन / Khabar Nation

भ्रष्टाचार की गंगोत्री परिवहन विभाग जिसके सर्वोच्च अफसर लिफाफा लेते हुए कैमरे में कैद होते हैं । आयकर छापों में दिल्ली तक अवैध पैसा जाने के सबूत मिलते हैं । मुख्यमंत्री और उनके खुद के परिजन घोटालों में कैद होते हुए नजर आते हैं। तो फिर क्या मजाल है कि अवैध वसूली करने वाले कंपनी को कोई हटा पाए ? यह मामला अफसरों के बेखौफ रवैए और राजनेताओं के मदमस्त होने की कहानी को उजागर करता है । अफसर हर प्रकार की शासकीय प्रक्रिया में लगे रहे कि किसी भी प्रकार इस कंपनी का कार्य किसी और को ना मिल पाए पर नयी टेण्डर प्रक्रिया अनुशंसा के बाद भी शुरू नहीं की।

मध्य प्रदेश के परिवहन विभाग में 2 साल से स्मार्ट चिप नामक कंपनी आम जनता से ₹27 और ₹36 अवैध तरीके से वसूल नहीं है । मध्य प्रदेश सरकार द्वारा वसूली को कानूनी जामा पहनाए जाने के तौर पर निकाला गया आदेश  ही असंवैधानिक माना जा सकता है । क्योंकि कोई भी सरकार कर वसूली के लिए अलग से फीस का निर्धारण नहीं कर सकती है । उस पर तुर्रा यह है कि जिस कंपनी के कामकाज की अवधि ही समाप्त हो गई हो किस आधार पर 2 साल तक काम कर सकती हैं ? 

गौरतलब है कि मध्यप्रदेश के राजपत्र में 5 दिसंबर 2013 को प्रकाशित नोटिफिकेशन के अनुसार परिवहन विभाग में शिक्षार्थी अनुज्ञप्ति, अनुज्ञप्ति केंद्रों का प्रबंधन करने, वाहन चालान अनुज्ञप्तियां तथा वाहन पंजीयन प्रमाण पत्र , बेव आधारित वाहन पंजीयन , वेब आधारित परमिट प्रणाली, अनापत्ति प्रणाली , फिटनेस प्रणाली,  इंटरनेट आधारित कर व फीस भुगतान प्रणाली,  शिक्षार्थी/ वाहन चालक अनुज्ञप्ति तथा फिटनेस अपॉइंटमेंट प्रणाली, दस्तावेजों की स्कैनिंग ,अनुज्ञप्तियों के लिए बायोमेट्रिक आधारित डी डुप्लीकेशन के लिए मैसर्स स्मार्ट चिप लिमिटेड के साथ 27 सितंबर 2013 के एक मास्टर सर्विस एग्रीमेंट की जानकारी देते हुए मध्य प्रदेश के समस्त परिवहन कार्यालयों में सेवा हेतु नियुक्त किया गया था ।  यह नोटिफिकेशन 5 साल के लिए लागू किया गया था । जिसकी अवधि 4 दिसंबर 2018 को समाप्त हो चुकी है ।

खबर नेशन के पास उपलब्ध दस्तावेजों के अनुसार एग्रीमेंट की शर्त में था कि इस कंपनी के कार्य के नवीनीकरण के लिए चार साल में ही रिकमेंडेशन कमेटी बनाकर प्रक्रिया का पालन किया जाएगा ।  जो परिवहन विभाग के दस्तावेजों के अनुसार बनाई ही नहीं गयी । मध्यप्रदेश मंत्रालय के परिवहन विभाग के दस्तावेजों के अनुसार 8 मार्च 2019 को परिवहन विभाग के उप सचिव एन ए खान ने नवीन निविदा आमंत्रित किए जाने के निर्देश देते हुए संपूर्ण प्रक्रिया पूर्ण होने तक उक्त सेवा प्रदाता कंपनी का कार्य जारी रखने की अनुशंसा की थी। परिवहन आयुक्त कार्यालय के अपर परिवहन आयुक्त महेंद्र सिंह सिकरवार ने गोलमोल तरीके से इस कंपनी को आगे कार्य जारी रखने का आदेश जारी कर दिया । हांलांकि इस आदेश को जारी करने के पूर्व परिवहन विभाग द्वारा बनाई गई तकनीकी समिति से फीस वृद्धि का प्रस्ताव भी स्वीकृत कराने की कोशिश की गई थी । सूत्रों के अनुसार जो लगभग पच्चीसस प्रतिशत वृद्धि के साथ किए जाने की मांग थी । जिसे परिवहन विभाग ने पांच प्रतिशत वृद्धि के साथ स्वीकार कर लिया ।
गौरतलब है कि नवंबर 2018 में मध्यप्रदेश में विधानसभा चुनाव हुए थे और नई सरकार का गठन दिसंबर 2018 में हो गया था । डेढ़ साल कांग्रेस की कमलनाथ सरकार रही। मार्च 2020 में मध्य प्रदेश में भाजपा की सरकार बन गई । ना अफसरों ने और ना ही राजनेताओं ने इस और ध्यान दिया । इसी बीच मध्य प्रदेश के सामाजिक कार्यकर्ता प्रदीप खंडेलवाल ने जो जन स्वराज्यम पार्टी के प्रदेश महासचिव है ने इस अवैध वसूली को लेकर मध्य प्रदेश लोकायुक्त को एक सप्रमाण शिकायत की थी । इसके बाद भी ना तो नए सिरे से इस कार्य के लिए परिवहन विभाग द्वारा कोई टेंडर जारी किया गया और ना ही इस कंपनी के कार्य को बंद किया गया । 
जब इस बारे में मध्यप्रदेश के परिवहन आयुक्त मुकेश जैन से चर्चा की तो उन्होंने कहा कि स्मार्ट चिप कंपनी का काम वैधानिक शर्तों के अनुसार चल रहा है। उन्होंने कहा कि अभी इस कार्य के लिए नए कॉन्ट्रैक्ट या टेंडर के बारे में कोई प्रस्ताव विचाराधीन नहीं है । हम शीघ्र ही नए सिस्टम वाहन सारथी को अपनाने जा रहे हैं । जिसके बाद ही इस कंपनी के कार्य के बारे में कोई निर्णय किया जाएगा।
प्रदीप खंडेलवाल का कहना है कि मेरी शिकायत लोकायुक्त में किस स्तर पर लंबित है इसकी जानकारी मुझे अभी तक प्राप्त नहीं हुई है लेकिन स्मार्ट चिप कंपनी द्वारा प्रतिमाह मध्यप्रदेश की आम जनता से पांच करोड़ रुपए अवैध तरीके से वसूले जा रहे हैं । जो लगभग दो साल में 120 करोड़ रुपए के लगभग आंकी जा सकती है । जिसका एक बड़ा हिस्सा मध्यप्रदेश के राजनेता और अफसरों तक पहुंचाया जाता है ।

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