शिवराज के बुलंद इकबाल से मंत्रिमंडल बेहाल


तबादलों को लेकर मंत्रियों  विधायकों में बढ़ती नाराजगी 
खबर नेशन/ Khabar Nation

 मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के अंतःपुर के  प्रिय सर्वोच्च आईएएस अधिकारी इकबाल सिंह बैंस के रवैए से शिवगणों (मंत्रिमंडल) और एवं  विधायकों सहित संगठन के नेताओं और कार्यकर्ताओं  के हाल बेहाल हो गए हैं।  तबादलों से संबंधित फाइलें मुख्य सचिव कार्यालय में डंप पड़ी है। जिसको लेकर मंत्रियों की नाराजगी बढ़ती जा रही है ।

गौरतलब है कि दिसंबर 2018 में मध्यप्रदेश में भाजपा के 15 साल के राज की समाप्ति के बाद कांग्रेस की सरकार बनी थी। जिसके बाद डेढ़ साल की अवधि में भरपूर तबादले हर विभाग में किए गए।तबादला उद्योग  खूब फला फूला । मार्च 2020 में कांग्रेस की कमलनाथ सरकार में व्याप्त अंतर्कलह चलते कांग्रेस के कद्दावर नेता ज्योतिरादित्य सिंधिया अपने 20 विधायकों से इस्तीफा दिलवा कर भारतीय जनता पार्टी में शामिल हो गए। 24 मार्च को मध्य प्रदेश में भाजपा की सरकार शिवराज सिंह चौहान के नेतृत्व में बनी । शीर्ष स्तर पर फेरबदल करते हुए शिवराज ने मुख्य सचिव एम गोपाल रेड्डी को हटाते हुए अपनेअंतःपुर के  विश्वस्त अफसर इकबाल सिंह बैंस को मुख्य सचिव बना दिया। मुख्य सचिव इकबाल सिंह बैंस कांग्रेस सरकार बनने के पूर्व में तत्कालीन शिवराज सरकार में वर्षों   सीएम सचिवालय में सचिव, प्रमुख सचिव के तौर पर पदस्थ रहे और तब भी उनकी तूती पूरे प्रशासनिक और  सत्ता के गलियारों में बजती रही। इस दौरान वे लगभग 10 साल साथ साथ रहे। बीच में संघ की नाराजगी के चलते बैंस को मुख्यमंत्री सचिवालय से दूर किया गया था ।इसके बावजूद बैंस और शिवराज के रिश्तो में खटास नहीं आई । 
अब हालात वर्तमान मध्यप्रदेश में भाजपा के सत्ता में आते ही प्रदेश के  अधिसंख्य कर्मचारी और अफसर जो कांग्रेसी शासन काल में इधर-उधर कर दिए गए थे वापस मनचाही पोस्टिंग पाने की जुगत भिड़ाने लगे । सरकार बनते ही कोरोना संक्रमण और उसके बाद मध्यप्रदेश में 28 विधानसभा सीटों पर उपचुनाव के चलते आचार संहिता लगी हुई थी। सो तबादले नहीं हो पाए। इधर सरकार बचाए रखने की जुगत में भाजपा के अदने से कार्यकर्ता से लेकर आला नेताओं और सांसद विधायकों एवं मंत्रियों ने कर्मचारियों और अफसरों सहित उनके परिजनों को आश्वस्त कर दिया कि उप चुनाव संपन्न होते ही मनचाही जगह पर तबादला करवा दिया जाएगा । लगभग एक माह बीतने को है ।कार्यकर्ताओं भाजपा के आला नेताओं और विधायक सांसदों का पूरा दबाव मंत्रियों पर बना हुआ है ।चुनाव आचार संहिता समाप्त हुए लगभग 1 माह बीतने वाला है और प्रदेश में नगरीय निकाय एवं पंचायत चुनावों को लेकर आचार संहिता लगने की संभावना बनी हुई है । ऐसे में दबाव और तेजी से बढ़ गया है । 
तबादलों को लेकर प्रतिबंध लगा हुआ है और समन्वय में मुख्यमंत्री के अनुमोदन  के बाद ही तबादला किए जाने की शर्त भी लगी हुई है । ऐसे में अफसरों और कर्मचारियों ने स्वैच्छा से तबादला किए जाने के आवेदन दे रखे हैं । ऐसा रास्ता इसलिए अपनाया गया क्योंकि वह तबादला प्रतिबंध के प्रतिशत से बाहर रह सके और सरकार के ऊपर आर्थिक बोझ ना पड़े । मंत्रियों ने सारे प्रस्ताव बनाकर विभागों को भेज दिए । जो वहां से जाकर मुख्य सचिव कार्यालय में अटक गए  । स्वैच्छा से किए गए तबादले समन्वय से बाहर रहना चाहिए लेकिन उन्हें भी समन्वय के आधार पर अटका कर मंत्रियों के अधिकारों पर अतिक्रमण का प्रयास किया जा रहा है। संवैधानिक तौर पर मुख्यमंत्री और कैबिनेट मंत्रियों के अधिकार एक जैसे होते हैं । केवल  समन्वय में  नेता होने के कारण  मुख्य मंत्री की शक्तियां है इस कारण तबादले की नश्तियों को मुख्य मंत्री के अनुमोदन के लिए भेजी  जाती  है । हालांकि तबादलों के मामले में समन्वय में ऐसे प्रकरण ही भेजे जाना चाहिए जो प्रशासनिक या राजनीतिक दृष्टि से किए जाना हो। इनमें स्वैच्छा के प्रकरण को शामिल किया जाना विस्मयकारी है ।
गौरतलब है कि मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री सुंदरलाल पटवा जब मुख्यमंत्री थे तब उन्होंने सार्वजनिक तौर पर कहा था कि सारे तबादले के अधिकार उनके पास है । एक चपरासी का तबादला भी वे स्वयं करते हैं । ठीक वैसे ही हालात आज शिवराज मंत्रिमंडल के हैं । शिवराज को पटवा के शिष्य के तौर पर जाना जाता है । 
सूत्रों के अनुसारयातो  समन्वय की फाइलें मुख्यमंत्री कार्यालय तक नहीं पहुंचाई जा रही है या मुख्यमंत्री कार्यालय से जो फाइलें अनुमोदित होकर आ रही हैं उन्हें भी अटकया जा रहा है । जिसको लेकर मंत्रियों की नाराजगी बढ़ती जा रही है । मंत्री कार्यकर्ताओं विधायकों सांसदों को जहां अपनी विवशता का रोना रो रहे हैं । वही विभाग पर भी अपनी पकड़ साबित नहीं कर पा रहे हैं।

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