स्वरचित कविता राजश्री "मृणालिनी" द्वारा-"झूठ-सच"
खबर नेशन / Khabar Nation
सुना था,
झूठ के पॉव नहीं होते।
सभी कहते हैं,
एक सच सब पर भारी।
ख्याल आया सच और झूठ की
तलाशी ले ही लूँ ।
सभी जगह देखा,
झूठ का था बोलबाला।
भूखे पेट सच को सिसकते देखा।
देखा झूठ की मक्कारी।
अपमानित होते सच को देखा,
कराह रही थी,
खुद को छुपा रही थी।
झूठ के डर से,
सच खुद ही फाँसी लगा रही थी।
ये देखकर ठिठक गए मेरे कदम,
कांप गया मेरा हृदय,
"झूठ की विरासत "
नई कोपलें तो विषधर बनेंगे,
बाटेंगे हलाहल,
असुरक्षित होगा संसार।
श्वास - श्वास को तरसेगा।
जिंदा लाश सा होगा जीवन।
स्वार्थ से जब सब होंगे पूर्ण,
नोचेंगे पूरा भूमंडल।
अपमानित होंगे राम के वंशज,
सम्मानित होगा रावण।
सीता को अब कौन बचाएगा,
चीर हरण का अब,
सब करेंगे परिहास।
सर झुका कर मौन बुद्धिजीवी,
करते सब कुछ नज़रअंदाज।
झूठ और सच की लड़ाई में,
कराह रही हैं धरती माता।
किया था जिसको सिंचित,
अपने आंचल में प्रेम दुलार से।
क्यों विषाक्त हो गया मानवता,
आस्तीन के सांप से।
कह रही है सजल नैनों से,
निकाल फेंको झूठ को,
खरपतवार सा।
झूठ के जहर से नष्ट ना करो ,
अपना अमूल्य जीवन।
पकड़ो सच का दामन
सच में ही तो बसेरा हैं
श्रद्धा, प्रेम और विश्वास का।
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गौरव चतुर्वेदी
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