कविता के माध्यम से सुमित ओरछा ने जेटली को दी श्रद्धांजली

 

हृदय हमारा फिर हिला

विछोह का ये सिलसिला

 

बयार कैसी चल रही है

खबर हमें ये खल रही है

 

क्या कहा ?क्या हो गया?

अरुण ही अस्त हो गया??

 

रो पड़े सब , ज्यों हुआ 

हे विधाता ...क्यों हुआ??

 

फलक में वो दीखते थे

सब उनसे ही तो सीखते थे

 

व्यवहार में थी शिष्टता

वाणी में सु- स्पष्टता

 

समन्वय के सेतु वो

थे राष्ट्रकार्य हेतु वो

 

हर शब्द शब्द तौलकर

बदले नहीं कभी बोलकर

 

विश्व भर में मान का 

पुंज थे वो , ज्ञान का 

 

साहस और शील भी

श्रेष्ठतम वकील भी

 

तर्क बहुत ,रोचक थे

सचमें संकटमोचक थे

 

उनके जैसा अब कोई कर पायेगा नहीं

स्थान उनका देश में, भर पायेगा नहीं

 

उत्कर्ष के आयामों पर अंकित है  नाम

परम श्रद्धेय जेटली जी ! अंतिम प्रणाम

 

 

आपका अनुयायी

कवि सुमित ओरछा

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