मध्यप्रदेश मानव अधिकार आयोग द्वारा दो मामलों में संज्ञान
खबर नेशन / Khabar Nation
बिना जुर्म किये संतोष भील को दो माह जेल में बंद रखा
पीड़ित को दो लाख रू क्षतिपूर्ति राशि दो माह में दे दें
आयोग ने की अनुशंसा
रायसेन जिले की सुल्तानपुर पुलिस द्वारा बिना किसी जुर्म के एक व्यक्ति को करीब 50 दिन तक जेल में रखे जाने के एक गंभीर मामले में मध्यप्रदेश मानव अधिकार आयोग ने राज्य शासन से कहा है कि पीड़ित को दो लाख रूपये दो माह में अदा किये जायें। उल्लेखनीय है कि आयोग में प्रकरण क्रमांक 8426/रायसेन/2021 में गहन जांच के पश्चात् आयोग ने अनुशंसा की है कि चूंकि थाना सुल्तानपुर के अपराध क्र. 291/17 में अनुसंधान अधिकारी द्वारा शिकायतकर्ता/पीड़ित संतोष पिता केशु भील को बिना किसी आधार के गिरफ्तार कर उसे न्यायिक अभिरक्षा में भिजवाने और करीब 50 दिन तक उसे जेल में रखा गया। इससे पीड़ित संतोष भील के जीवन और स्वतंत्रता के मौलिक/मानव अधिकारों का घोर उल्लंघन हुआ। अतः मध्यप्रदेश शासन पीड़ित संतोष भील को दो लाख रूपये क्षतिपूर्ति राशि अगले दो माह में अदा करे। आयोग ने कहा है कि राज्य शासन चाहे, तो अदा की गई यह क्षतिपूर्ति राशि संबंधित लोकसेवकों से वसूल कर सकता है।
उपजेल बेगमगंज में बंदी प्रवेन्द्र से सहायक जेल अधीक्षक द्वारा मारपीट करने का मामला
जेलों में बंदियों की सुरक्षा के लिये सुदृढ़ निगरानी प्रणाली स्थापित की जाये
आयोग ने की अनुशंसा
रायसेन जिले की उपजेल बेगमगंज में कैद एक बंदी प्रवेन्द्र के साथ सहायक जेल अधीक्षक द्वारा बुरी तरह मारपीट कर उसे प्रताड़ित किये जाने की एक शिकायत मप्र मानव अधिकार आयोग को मिली। पीड़ित बंदी की माता हीराबाई चढ़ार ने आयोग में दिये अपने शिकायती आवेदन में कहा कि उसके पुत्र प्रवेन्द्र को पुलिस थाना बेगमगंज के एक आपराधिक मामले में उप जेल बेगमगंज में न्यायिक अभिरक्षा में रखा गया था और फरियादी पक्ष के दबाव में जेल के अंदर जेलर व अन्य द्वारा उसके पुत्र के साथ आये-दिन बुरी तरह मारपीट कर उसे शारीरिक व मानसिक प्रताड़ना दी जाती है। शिकायत मिलते ही आयोग ने 25 अगस्त 2021 को मामला दर्ज कर जांच में ले लिया। तबसे मामले की लगातार सुनवाई के बाद मप्र मानव अधिकार आयोग ने अनुशंसा की है कि मप्र शासन केन्द्रीय, जिला व उपजेलों में भी जेल के अन्दर बंदियों की देखभाल और सुरक्षा के लिये डिजिटल टेक्नालाॅजी पर आधारित निगरानी प्रणाली स्थापित की जाये, जिससे जेल में बंदियों की सुरक्षा और देखभाल में होने वाली किसी भी मानवीय या तकनीकी चूक या उदासीनता का ठोस प्रमाण मिल सके। जेल के अन्दर बंदी की देखभाल और सुरक्षा में उपेक्षा बंदियों के मौलिक/मानव अधिकारों के उल्लंघन होने के बाद भी सही स्थिति प्रकट नहीं हो पाती है, क्योंकि जेल प्रबंधन बंदियों और अधीनस्थ जेल कर्मचारियों पर इस सीमा तक नियन्त्रण रखता है कि कई बार सही स्थिति जेल के बाहर तक नहीं आ पाती है।
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गौरव चतुर्वेदी
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