मध्यप्रदेश में महिलाओं ने बनाई नई पहचान

भोपाल। मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के महिला सशक्तिकरण के संकल्प से प्रदेश के ग्रामीण इलाकों की महिलाओं की दशा और दिशा में सकारात्मक बदलाव आ रहे हैं। चौके-चूल्हे और घूँघट में सिमटी महिलाएं आज तरह-तरह के सम्मानजनक काम कर परिवार की आर्थिक दशा सुधारने के साथ प्रदेश के विकास में भी सहयोगी बन रही हैं।

अनूपपुर जिले के पुष्पराजगढ़ की इन्दू अग्रवाल 5 बेटियों की शिक्षा और भविष्य को लेकर हमेशा परेशान रहती थीं। कहीं कोई आस नजर नहीं आती थी। एक दिन किसी ने उनको आजीविका स्व-सहायता समूह से जुड़ने की सलाह दी। समूह से जुड़ने के बाद इन्दू उसकी गतिविधियों में हिस्सा लेने लगी इससे उन्हें होने वाले लाभों की जानकारी मिली। इन्दू ने समूह से पहली बार 35 हजार रुपये का ऋण लेकर सिलाई के काम को बढ़ाने के साथ रेडीमेड कपड़ों का व्यवसाय शुरू किया। धीरे-धीरे आमदनी बढ़ने लगी। उन्होंने ऋण चुकाने के साथ दुबारा ऋण लिया और किराने की दुकान भी खोल ली। आज इन्दू 4 बेटियों की शादी कर चुकी हैं। आजीविका मिशन और सरकार को भरपूर दुआएं दे रही हैं। 

अनूपपुर जिले के आदिवासी बाहुल्य ग्राम टिटही की मोहवती को रोजमर्रा की जरूरत पूरी करने के लिये भी संघर्ष करना पड़ता था। पति की कोई स्थाई आमदनी नहीं थी। स्व-सहायता समूह से जुड़कर मोहवती ने सबसे पहले 4000 रुपये का ऋण लेकर चाय की दुकान शुरू की। चाय की दुकान के लाभ से ऋण चुकाने के बाद उसने किराने की दुकान के लिये पुन: 10 हजार रुपये का ऋण लिया। दोनों ही व्यवसाय वह अपने पति जयपाल सिंह के साथ सम्हालने लगी। इससे पारिवारिक आय भी बढ़ी और पुन: 5000 का ऋण लेकर सिलाई का काम शुरू किया। आज पहले की तुलना में मोहवती और जयपाल सिंह के पारिवार की आर्थिक स्थिति में भारी परिवर्तन आ चुका हैं। टूटा-फूटा घर रहने लायक बन चुका हैं। घर में मोटर साईकिल, टीव्ही और अन्य सुख सुविधा की वस्तुएं स्थान लेने लगी हैं। 

ग्वालियर में राज्य शासन की दीनदयाल राष्ट्रीय आजीविका मिशन योजना गरीब महिलाओं का सम्बल बन रही हैं। नगर निगम द्वारा आस वेलफेयर फाउण्डेशन के सहयोग से 10-10 महिलाओं के लिये सिलाई केन्द्र संचालित किया जा रहा हैं। इसमें करीब 22 महिलाएं कपड़े से थैले बनाकर परिवार के लिये अतिरिक्त आय जुटा रही हैं। केन्द्र में काम करने वाली प्रीति जाटव कहती हैं कि उनके पति कारीगर हैं परंतु कभी काम मिलता हैं कभी नहीं। मेरा दूसरों के घर में झाडू-पोंछा करने का काम घरवालों को पसंद नहीं था। अब आमदनी भी ज्यादा हैं और घरवाले भी खुश। कपड़ों के झोले शहर को पॉलिथिन मुक्त बनाने में मदद भी कर रहे हैं।

मुरैना जिले के कैलारस में आलोपी शंकर स्व-सहायता समूह और खेड़ाकला के कबीर शाह स्व-सहायता समूह की महिलाएं हर्बल साबुन का निर्माण कर रही हैं। इन्हें कैलारस बीआरसी से 20 हजार हर्बल साबुन बनाने का आर्डर मिला हैं जिससे वे बहुत उत्साहित होकर काम कर रही हैं। साबुन की लागत 15 रुपये आती हैं जिसे वे 18 रुपये में बेचती हैं। बाजार में इसकी कीमत 20-25 रुपये हैं। समूह को शासकीय स्कूलों से भी 23 हजार साबुन बनाने का आर्डर मिला हैं। सप्लाई के बाद इनको 69 हजार रुपये का फायदा होगा। महिलाओं ने साबुन बनाने का प्रशिक्षण आजीविका मिशन के तहत ग्वालियर के मॉ दुर्गा स्व-सहायता समूह से लिया हैं। 

टीकमगढ़ जिले के ग्राम हथेरी की प्रीति यादव कहती हैं कि पैसों की तंगी के चलते घर चलाने में बहुत परेशानी होती थी। घर के बाहर निकलना न के बराबर होता था। कुछ समझ में नहीं आ रहा था कि आमदनी कैसे बढ़ायें। ऐसे में एक दिन आजीविका मिशन से जुड़ी महिलाओं से मुलाकात हुई। आस की किरण नजर आई। समूह से जुड़ गई और गांव में कियोस्क सेंटर चलाने का निर्णय लिया। गांव से बैंक की दूरी 12 किलोमीटर थी। प्रीति ने बैंक के अधिकारियों से बात की और समूह से 15 हजार रुपये का ऋण लिया। घर में कियोस्क सेंटर खोला और कम्प्यूटर से गांव वालों के बैंक संबंधी काम कर रही हैं। गांव वालों को गांव में ही बैंक सुविधा और प्रीति को 10 हजार रुपये प्रतिमाह की आमदनी मिलने लगी। आज उसके बच्चे भी अच्छे स्कूल में पढ़ने लगे हैं।

(खबरनेशन / Khabarnation)


 

Share:


Related Articles


Leave a Comment