राफेल पर रेफरेंडम; चोर पर जनादेश: गोविन्द मालू

राजनीति May 26, 2019

खबरनेशन/Khabarnation   

चुनाव पूर्व जब कई डिबेट में मैं यह कहता था कि कांग्रेस दो चौकों से आगे बढ़ कर  दो छक्के भी नहीं लगा पाएगी और फिर विपक्ष के दर्जे के फिर लाले पड़ेंगे तो कई लोग (कांग्रेसी मानसिकता के,मोदी पूर्वाग्रही ) हँसी उड़ाते थे,कई से तो शर्त भी बदी जो मैंने अब जीती है।

सवाल यह है कि आकलन, प्रचार, रणनीति,कैम्पेन डिज़ाइन करते वक़्त हम वस्तुनिष्ठ क्यों नहीं रह पाते, सचाई से रूबरू होकर सत्य से साक्षात्कार क्यों नहीं कर पाते, जन -मन की थाह की तलहटी में क्यों नहीं उतर पाते। भावनाओं, अर्थमेटिक और केलकुलेशन के आधार पर आकलन सत्य के निकट नहीं हो सकता। चुनाव एक रसायन शास्त्र है ना कि गणित जिसमें हमेशा 2 और 2 चार ही होते हैं।

दो नकारात्मक मुद्दे और एक सकारात्मक मुद्दा काँग्रेस को ले डूबा।

राफेल पर रेफरेंडम और क्या नरेंद्र मोदी चोर है? पर जनमत सँग्रह के रूप में यह चुनाव काँग्रेस ने खड़ा कर दिया था।

इस नकारात्मक प्रचार में न्याय योजना जनता में पहुँचाने में काँग्रेस कहती है हम कामयाब नहीं हुए, यह सच नहीं है कि, जनता तक ग़रीब के खाते में  72,000 पहुंचाने की कथित न्याय योजना नहीं पहुँची।लोगों को काँग्रेस के वादे पर भरोसा नहीं हुआ, क्योंकि भाजपा ने अपने प्रचार में जोर- शोर से प्रचार किया कि गरीबी हटाओ के वादे के बाद काँग्रेस ने ग़रीब हटाए, गरीबी नहीं हटाई। हरित क्रांति के नारे से लेकर  "'काँग्रेस का हाथ आम आदमी के साथ "" का मख़ौल चटखारेदार और तथ्यों के साथ भाजपा ने हर रैली में उड़ाया। और सबसे बड़ी बात न्याय को लेकर राहुल की वो दलील कि इसका पैसा देश छोड़ कर भाग चुके धनपतियों से वसूला जाएगा। जनता जानती है कि इन धनिकों को पब्लिक मनी से और धनवान एनडीए सरकार ने नहीं यूपीए ने बनाया था। मोदी राज में तो वसूली और कारागार जाने से बचने उन्हें गुपचुप देश छोड़ कर भागना पड़ा।

राफेल को काँग्रेस बोफोर्स बना देना चाहती थी पर काँग्रेस, भाजपा के संसद में और बाहर भी तथ्यों सहित अपनी बात रख देने के बाद भी ,अनिल अंबानी के नाम से प्रधानमंत्री को चोर-चोर कहकर  शोर मचा रही थी। संसद में रक्षा मंत्री निर्मला सीतारमण के राफेल चर्चा पर अंतिम भाषण में  जो प्रभावी उद्बोधन दिया उससे देश सन्तुष्ट था।

देश का मानस  ईमानदार को चोर अकारण कहना बर्दाश्त नहीं कर सकता। जिस जन मानस ने एक प्रतिमा में प्राण प्रतिष्ठा कर उसे पूजनीय बनाया, वह उसी का प्रतिमा भंजन नहीं कर सकता और जो करेगा उसे औरंगजेबी संस्कृति का क्लोन मानकर धूल चटा देगा ,वही किया भी।

इस चुनाव में भ्रष्टाचार और महंगाई मुद्दा नहीं थे,ना बन सके। वहीं दूसरी ओर सम्प्रदायिकता,धर्मनिरपेक्षता जैसे शब्द चर्चा से,भाषणों, बहस, अखबारों के विश्लेषणों से सिरे से ग़ायब थे। इसके बरअक्स कौन बड़ा हिंदु दिखे इसकी होड़ में विपक्ष आगे था।

पाँच साल सत्ता में रहने के बाद भी यदि भाजपा आक्रामक, तीखे तेवर का प्रचार अभियान चला रही थी तो काँग्रेस चरित्र हनन की राजनीति क्यों कर रही थी? देश के सामने असफलता पर पश्चाताप कर नया विकास ,सुसाशन का ब्ल्यू प्रिंट क्यों नहीं रख पाई? यदि, आप गांधी जी, सरदार पटेल, लालबहादुर शास्त्री, गुलजारीलाल नंदा, मोरारजी देसाई, नरसिंहराव को चोर कहेंगे तो जनता आपको क्या सन्निपात में नहीं ला देगी। नेहरू गाँधी परिवार के खिलाफ बोलने वाले विपक्ष को राजीव गाँधी के नव आगमन पर "मिस्टर क्लीन" कहने पर कोई आपत्ति तो दूर इसके खिलाफ बोलने का साहस नही था।और जब बोफ़ोर्स का भरोसा जनता ने खुद महसूस किया तो प्रतिमा को खण्डित करने में देर नही की।जनता की निर्णय लेने दीजिए, सोचने दीजिए आप निर्णय करने वाले कौन?

काँग्रेस ने पूरी ताकत, क्षत्रप और पूरे गाँधी खानदान को चुनाव में झोंक दिया, (अब तो रेहान और मारिया ही शेष हैं जिन्हें आने मे दशक लगेगा) बावजूद वजूद नहीं बचा। राहुल कहते थे काँग्रेस एक सोच है, लेकिन अब सोच में पड़ शोचनीय हो गई।

भारत की जनता सच स्वीकारने पर माफ़ भी जल्दी करती हैं, झूठ बोलने पर धूल भी चटाती है। काँग्रेस इस धूल में से ही अपने लिए फूल निकाल ले तो काँग्रेस इतिहास के कूड़ेदान में जाने से बच सकेगी,वरना काँग्रेस के हिस्से एनसीपी, तृणमूल, वाय एस आर की अहमियत 10 जनपथ से ज्यादा होगी।

"अँगुली कटा के वे शहीदों में हुए थे शामिल।

दिलेरी देखिए उनकी दांत से काट ली अँगुली।"

 

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