लोक परम्परा का हिस्सा है गाली-गीत
खबर नेशन / Khabar Nation
भारतीय समाज में शादी एक ऐसा सामाजिक अनुष्ठान है जो रवायतों,विधि विधानों और तमाम कार्मिक संस्कारों से ओत-प्रोत होते है।
इसमें कहीं हास-परिहास तो कहीं गाली-गीतों की सदियों पुरानी परंपरा दिखती है। इस उत्सवी परिपाटी के अनेक रंग और कई आयाम है। विवाह आदि अवसर पर जब दूर-दूर के नाते रिश्तेदार एक साथ एक जगह इकठ्ठा होते है तब हर्षोल्लास का ऐसा वातावरण बनता है कि औपचारिक बाध्यताए टूट कर स्वत:स्फूर्त हास्य परिहास में परिणत हो जाती है।
जीवन जड़ों की यात्रा में अर्वाचीन लोक मान्यताएं ही हमें मानुष और माटी का महत्व सिखाती है ।इधर कुछ वर्षों में माटी के इस रंग ने अपनी आभा को खोया है। अगर थोड़ा उत्तर की तरफ बढ़े तो ये मान्यताएं अपने देशज और भदेस रूप में ज्यादा दिखती हैं।जहां परिहास रूपी स्थानीय गालियों का खूब चलन है। विवाह आदि में व्यंग्यात्मक उलाहना भरी गालियों ने इस प्रदेश की रवायत को और उर्वरा बनाया है। वैसे तो पूरे बिहार में इसका चलन है लेकिन खासतौर से मिथिला में इसका सबसे ज्यादा और अतितातीत प्रभाव दिखता है। इसकी ऐतिहासिक और पौराणिक शुरुआत मिथिला की धरती ही मानी जाती है।
दरअसल राम सीता के विवाह काल से ही इस परम्परा के शुरुआती साक्ष्य मिलते है। जब राम शादी करने मिथिला आते है तो मिथिला की स्त्रियाँ छेडछाड़ करते हुए उन्हें गाली देती है। बाद में यह रस्म विवाह आदि जैसे सामाजिक अनुष्ठान का हिस्सा बन गई । इसे वहां डहकन कहा जाता है। डहकन गाने के पीछे ऐसी मान्यता है कि यह पारिवारिक उत्सवों को सरलता और तरलता से भर देती है। घर के ज्यादातर नाते-रिश्तेदार किसी न किसी के ननद, देवर, भाभी, साली, सलहज, जीजा आदि होते हैं। मिथिला में इन सबके साथ छेड़छाड़ करने का रिवाज है। ऐसे खुशी के मौके पर सभी एक दूसरे के साथ चुहल करते है। गीत का रूप दे कर गाने से इसका आनंद दोगुना हो जाता है।
विवाह में बारातियों को खास तौर से समधि को समधन द्वारा गाली दिये जानें का चलन है। खासतौर से मड़वा पर भात खाने आये दूल्हे के बड़े भाई (जेठ) भैसुर और नाते रिश्तेदारों को गाली न दिया जाये तब तक बात बनती नहीं।
यहां तक कि तो चाचा, मामा, फूफा और दोस्त नाराज होकर मंडप छोड़कर भाग जाते हैं। कई बार संबंध टूट जाते हैं।शादी की रस्मों में मुख्य भूमिका निभाने वाले नाई और पंडित को भी नहीं बख्शा जाता।दूल्हे को भी कोहबर के दौरान गाली सुननी पड़ जाती है।इसमें आह्लाद,उन्माद और उल्लास छुपा होता है।
ऐसा माना जाता है कि इसके ज़रिये स्त्रियां अपने भीतर की दबी ऐन्द्रिकता यानि यौनिकता को बाहर निकालती है। क्योकि उन्हे बाहर निकलने या लोगों, खास तौर से पुरुषों से बात करने की इजाजत नहीं होती। ऐसे में वे अपनी दबी हुई ऐन्द्रिकता को ‘गाली गीत’ के ज़रिये बाहर निकालती है ।ये भदेस गालियाँ एक बड़ी मनोवैज्ञानिक भूमिका निभाती है ।
इन गाली गीतों की कुछ ऐसी बानगी जिसमें प्रेम, मनुहार, उलाहना, व्यंग्य और लोक परिहास स्पष्ट पुट दिखता है ये मड़वा पर समधि को दी जाने वाली गाली है-
इहे मोरे समधि के बड़े-बड़े हाथ रे
ओही हाथे छुअलन मरबा हमर रे
मारु,हाथ काटू उनका यहां से भगाउ रे
परंपराएं सदियों से हमारे लोकाचार का हिस्सा रही जिनका हमारे जीवन और हमारी मन: स्थिति से बड़ा गहरा नाता रहा है। जीवन के राग,भाग,उल्लास और तीज त्यौहारों में प्रचलित मान्यताये इस सांस्कृतिक ग्रह पर बने हमारे बने होने का संकेत है।
हास, परिहास, व्यंग, आमोद- प्रमोद दरअसल हमारे व्यक्तित्व के भीतरी रंग है जो हमें जज्बातों से जोड़ते है और हमारी अर्वाचीन संकृति की ओर हमें उन्मुख करते है। रवायतों का हमारे ज़ीवन में संग-संग होना हमारे उल्लासित और संवेदी होने का परिचायक है। गाली-गीत हमारे संबंधों को पुख्ता करते है।इसे अपमान से तो बिल्कुल भी नहीं जोड़ा जाना चाहिए। ये ज़ीवन का आधार है।लोक मान्यताये बची है तो हम बचे है हमारी हंसी और हमारी मुस्कुराहट बची है। इसलिए मानस को बचाना है तो लोकायतो का भी जीवित रहना ज़रूरी है।ऐसे में गीत गाली जैसी लोक परम्परा को अक्षुण्ण रखना तो बहुत ज़रूरी होगा।ये हमारी थाती है जिसमें जीवन का उल्लास छुपा है।
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