मुर्गीपालन व्यवसाय अपनाकर आदिवासी महिलायें बनीं स्वावलम्बी

भोपाल। सागर जिले के देवरी विकासखण्ड की चिरचिटा सुखजू ग्राम पंचायत की आदिवासी महिलाओं ने मुर्गीपालन का व्यवसाय अपनाकर अपनी एक अलग पहचान बना ली हैं। गाँव की लक्ष्मीबाई और चन्दानी बाई कहती हैं कि छ: साल पहले लकड़ी काट कर बेचने जाती थीं। अब मुर्गी उत्पादक सरकारी समिति, देवरी की सदस्य हैं। इस समिति में 15 गाँव की 489 महिला सदस्य हैं। कुछ वर्ष पूर्व जब जिला गरीबी उन्मूलन परियोजना के अधिकारी ने व्यवसाय करने का सुझाव दिया, तब गांव की महिलाओं ने ग्रामीण स्तर पर स्व-सहायता समूह गठित कर मुर्गीपालन व्यवसाय करने की ठानी। 

चिरचिटा गाँव के 105 परिवारों में से 69 परिवार मुर्गीपालन व्यवसाय कर रहे हैं। इन्हें कंपनी मुर्गीपालन का प्रशिक्षण देती और चूजे प्रदान करती हैं। एक से डेढ़ माह में यह चूजे लगभग दो किलो तक के हो जाते हैं। लक्ष्बीबाई कहती हैं कि चूजे जब बड़े हो जाते हैं, तो व्यवसायी गांव आकर उन्हें ले जाते हैं। अब इस व्यवसाय से 6-7 हजार रूपये की मासिक आमदनी आसानी से होने लगी हैं।

चन्दानी बाई कहती हैं कि पहले हमने सागर जिला तक नहीं देखा था, लेकिन अब बाहर जाकर भी काम सम्भालती हैं। गाँव में विलेज मेम्बर भी नियुक्त किये गये हैं, जो आदिवासी महिलाओं को शिक्षित बनाने में सहयोग देते हैं।

महिला मुर्गी उत्पादक सहकारी समिति की महिलाएँ खुश हैं कि उनकी आर्थिक स्थिति अब पहले से बेहतर हैं। अब दिनभर लकड़ी काटने नहीं जाना पड़ता और बच्चे स्कूल जाकर बेहतर शिक्षा भी प्राप्त कर रहे हैं। (खबरनेशन / Khabarnation)

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