क्या मतदान से पहले ही भाजपा की लुटिया डूब रहीं?

 

अजीत लाड़ / खबर नेशन Khabar Nation

देश की सियासत में इन दिनों मध्यप्रदेश केंद्र बिंदु बना हुआ है। चुनाव आयोग ने सूबे की 28 सीटों पर उपचुनाव की तारीखों का एलान कर दिया है। जिसके साथ ही चुनावी नारों और वादों का शोर भी अब सुनाई देने लगा है। 28 सीटों पर होने वाला यह उपचुनाव किसी रणभेरी से कम नहीं, क्योंकि इस चुनावी चक्रव्यूह को तोड़कर सूबे के लिए "अर्जुन" बनने वालों की कमी नहीं। इस चुनाव में कोई अकेले चुनाव लड़ता नहीं दिख। यह चुनावी रण तीन खेमों में बंटा दिख रहा। जिसमें एक तरफ़ शिवराज सिंह चौहान है, दूसरी तरफ़ कमलनाथ हैं तो तीसरी तरफ़ भाजपा में होते हुए भी अलग खेमा ज्योतिरादित्य सिंधिया का है। जो हर चुनावी सभा में महाराज को जिताने का हुँकार भर रहें हैं। कुल-मिलाकर कहा जाएं तो मध्यप्रदेश की सियासत अब ऐसी हो चुकी है कि कौन किसकी तरफ़ है। यह समझ पाना टेढ़ी खीर मालूम पड़ता है। 

मध्यप्रदेश के सियासी रणवीरों के बयान भी स्पष्ट दर्शाते हैं कि यह चुनाव अब कांग्रेस-भाजपा से निकलकर व्यक्तिगत हो चला है। हर किसी की साख दांव पर लगी है। फ़िर वह ज्योतिरादित्य सिंधिया हो, या फ़िर शिवराज सिंह चौहान। 15 वर्षों तक सत्तासीन रहें शिवराज सिंह चौहान की हालत तो ऐसी हो गई है कि अब उनके बयानों से भी कुर्सी जाने का भय स्पष्ट दिखता है। बीते दिनों शिवराज सिंह चौहान ने कहा कि "भाजपा हार गई तो मैं मुख्यमंत्री नहीं रहूंगा, मुझे झोला टांगकर जाना पड़ेगा।" एक दूसरे बयान में शिवराज सिंह को कहना पड़ा कि "मेरी लाज रखो, प्रत्याशियों से कोई भी दिक्कत हो इसकी सजा मुझे मत दो।" ये दोनों बयान कहीं न कहीं शिवराज की मजबूरी और लाचारी को स्पष्ट बयां कर रहें कि भले सत्ता में बने रहने के लिए 28 में से मात्र 9 सीटें उन्हें चाहिए, लेकिन उनकी स्थिति अच्छी नज़र नहीं आ रही। 

वैसे स्थिति बेहतर दिखेंगी भी कैसे? जो खेल भाजपा और शिवराज सिंह ने मध्यप्रदेश में खेला उसके उल्टा पड़ने का डर हर क्षण भाजपा और शिवराज को सता रहा है। उपचुनाव में जिस तरीके से कांग्रेस ने बिकाऊ और टिकाऊ को मुद्दा बनाया है। उससे कहीं न कहीं भाजपा की नींद उड़ी हुई है। ऊपर से जले पर नमक डालने का काम सिंधिया के गाहे-बगाहे आने वाले बयान दे जाते हैं। ज्योतिरादित्य सिंधिया जनसभाओं में कहते नज़र आते हैं कि "ये भाजपा का या शिवराज का नहीं महाराज का चुनाव है, इसलिए वोट दे।" अब जरा सोचिए अगर यह चुनाव ज्योतिरादित्य सिंधिया का है, फ़िर शिवराज सिंह चौहान का भविष्य तो दांव पर लगना स्वाभाविक है। यहाँ एक बात यह भी है ज्योतिरादित्य सिंधिया अब भाजपा के लिए एक ऐसा निवाला बन रहे हैं, जो न निगलते बन रहा और न ही उगलते। तभी तो कभी मध्यप्रदेश की राजनीति में हवा उड़ती है कि ज्योतिरादित्य सिंधिया के क़रीबी तुलसीराम सिलावट सहित कई सिंधिया समर्थक को भाजपा का शीर्ष नेतृत्व हराने की जुगत में लगा हुआ है। वैसे जिस सिंधिया ख़ेमे से 11 के क़रीब मंत्री चुनाव मैदान में हो वो चुनाव में जीतते हैं। तो शिवराज सिंह चौहान के लिए मुसीबत खड़ी होना तय भी है। 

कुछ दिनों से सूबे में चल रहे घटनाक्रम पर ही गौर कीजिए। सभी निर्दलीय विधायक एकाएक तो भाजपा से जुड़ते नहीं होंगे। कहीं न कहीं इसके पीछे कोई राज होगा। चलिए बात समझ नहीं आई। तो नरोत्तम मिश्रा के बयान से बात समझते हैं। उन्होंने बीते दिनों कहा कि "भाजपा को अब सरकार बनाने को सिर्फ दो सीटें ही तो जीतना है, वो जीत लेंगे।" मतलब साफ़ है भाजपा को उपचुनाव से ज़्यादा उम्मीद दिखाई नहीं पड़ रही। तभी वह आएं दिन कभी निर्दलीयों का समर्थन ले रहीं। कभी कांग्रेस को ओर तोड़ने पर लगी हुई है। यहां एक बात तो तय है, भाजपा भले ही कितने दांव-पेंच वाली सियासत कर लें, लेकिन कमलनाथ और कांग्रेस ने पूरी भाजपा के नाक में दम कर रखा है। वरना क्या जरूरत थी, मांधाता जैसे भाजपा के गढ़ में मुख्यमंत्री की दो-दो जनसभाओं की और आगे एकाध रैली प्रस्तावित सो अलग। 

इस उपचुनाव में भाजपा कहीं न कहीं बैकफ़ुट पर है। हो भी क्यों न। जिस कार्यकर्ता ने वर्षों दरी बिछाने का कार्य किया। उसे एक झटके में दरकिनार कर उन 25 लोगों को टिकट दे दिया। जिस पर कांग्रेसी बिकाऊ होने का तमगा लगा रहें। फ़िर भाजपा के लिए एक तरफ़ कुंआ तो दूसरी तरफ़ खाई की स्थिति होना तो स्वाभाविक है ही। वैसे भाजपा अब भी कांग्रेसी विधायकों को अपने पाले में लाने का खेल जारी रखें हुए हैं। हालिया भाजपा में शामिल होने वाले दमोह से कांग्रेस राहुल सिंह लोधी है। जो अपने चचेरे भाई बड़ा मलहरा विधायक प्रद्युम्न सिंह लोधी के भाजपा में शामिल होने के बाद कहते फ़िर रहें थे कि कांग्रेस ने ही उन्हें राजनीतिक रूप से सक्षम बनाया है और इसलिए वह हमेशा कांग्रेस के साथ ही रहेंगे। उस दौरान उन्होंने कहा था कि परिस्थितियां कैसी भी आ जाएं वह कांग्रेस का साथ नहीं छोड़ेंगे लेकिन आज वह भी भाजपा का दामन थाम चुके हैं। ऐसे में उपचुनाव के नतीज़े क्या होंगे यह तो अभी भविष्य के गर्भ में है, लेकिन एक बात तय है। भाजपा को कहीं न कहीं उपचुनाव से अधिक उम्मीद नज़र नहीं आ रही है। तभी वह आएं दिन कांग्रेस में सेंधमारी जारी रखें हुए है, लेकिन उपचुनाव के बाद कहीं महत्वाकांक्षाओं की राजनीति में भाजपा के लिए यह सेंधमारी भारी न पड़ जाएं, इसके लिए भी सचेत रहना पड़ेगा, क्योंकि राजनीति में कोई सगा नहीं होता। यह उक्ति बड़ी प्रचलित है। वैसे भी इमरती देवी का यह बयान कि "मैं डबरा के लोगों से वोट मांग रही हूं, पार्टी (भाजपा ) जाये भाड़ में।" अपने-आप में कई सवाल खड़ें करता है। देखें वीडियो https://youtu.be/3JZcBsXdpOY

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