श्मशानों में मनमानी, प्रशासन का नियंत्रण नहीं

एक जगह Jan 12, 2021


गिद्ध भी शर्मसार हो जाए 
दाह कर्म कराने वालों की नोंच-खसोट से 
इंदौर 
साभार प्रजातंत्र से वरिष्ठ पत्रकार कीर्ति राणा की कलम
खबर नेशन / Khabar Nation

दानदाताओं के सहयोग से शहर के श्मशानघाट तो खूबसूरती में पिकनिक स्मेंपॉट जैसे होते जा रहे हैं लेकिन दाह कर्म के लिए जो लूट मची हुई है वह दिए तले अंधेरा समान है।कहने को सभी श्मशानघाट में विकास समितियां भी हैं लेकिन कुछ जगह ही नियंत्रण नजर आता है। बाकी किसी श्मशानघाट में टाल वाले से, प्रभारी से दाह कर्म कराने वालों की सेटिंग है, यही वजह है कि इनके लिए दाह संस्कार के लिए शव लाने वाले परिजन मोटे मुर्गे के समान है, उसकी हैसियत भांप कर उसमें लालच का छूरा उतनी ही तेजी से चलाया जाता है। नगर निगम ने तो लकड़ी-कंडे आदि के दाम निर्धारित कर रखे हैं लेकिन दाह कर्म कराने वाले कथित पंडों के द्वारा जिस तरह मनमाना शुल्क वसूला जा रहा है, उस नोंच-खसोट से तो गिद्ध भी शर्मसार हो सकते हैं। कोरोना काल में तो इन लोगों के लिए मतृक के परिजन मोटी वसूली का जरिया हो गए थे।इसके बाद से चला कथित लूट का यह सिलसिला थमा नहीं है। 
मनमानी का आलम यह है कि श्मशानघाट में लकड़ी-कंडे आदि का जो शुल्क निर्धारित है उससे अधिक की वसूली दाह कर्म की विभिन्न विधियां सम्पन्न कराने वाले ये कथित पंडित वसूल रहे हैं। जिला प्रशासन भूमाफिया, ड्रग माफिया और न जाने कितने तरह के माफियाओं पर कार्रवाई कर रहा है श्मशानघाटों में-खासकर हिंदू समाज-मची इस ‘भावनात्मक लूट’ पर भी नकेल लगाना चाहिए।
श्मशानघाटों पर वर्षों से तैनाती के कारण इन पंडों के एजेंट के रूप में काम कर टाल संचालक, प्रभारी आदि की मनमानी पर नकेल लगाना भी जरूरी है। शवदाह के लिए आने वाले लोग जिस लूट का शिकार हो रहे हैं, उसकी चिंता जिला प्रशासन, नगर निगम को तो कतई नहीं है। 
परिवार के सदस्य को दाह संस्कार के लिए लाने वाले शोक-सदमे-भावनाओं का शिकार होने से उस वक्त दक्षिणा आदि के संबंध में कुछ पूछने की स्थिति में नहीं रहते इसका फायदा और मान्यताओं का डर दिखाकर कतिपस पंडों द्वारा दाह संस्कार वाले दिन से लेकर तीसरे अस्थि संचय-विसर्जन की विधि-पूजा आदि के नाम पर मनचाही राशि वसूली जा रही है।दाह संस्कार करने आए कतिपय परिजनों की इस प्रतिनिधि ने यह स्थिति भी देखी है कि बजट से अधिक राशि होने पर उन्हें शर्मसार होना पड़ा और  अंतिम संस्कार में आए अपने निकटस्थ मित्रों के आगे हाथ फैलाना पड़ा है।

सिख समाज में यह व्यवस्था

श्री गुरु सिंघ सभा कार्यकारिणी मेंबर जगजीत सिंह टूटेजा ( सुग्गा भैया) के मुताबिक 
500 ₹ : शव वाहन या मर्चुरी बॉक्स के, यह राशि भी ऐच्छिक है। 
500 ₹ : समाज के किसी सदस्य के निधन पर अरदास के लिए श्मशानघाट पर अरदास के लिए जाने वाले ज्ञानी जी को दिए जाते हैं।यह भी ऐच्छिक है। 
7200₹ : दिवंगत की आत्मा की शांति के लिए 48 घंटे तक चलने वाले अखंड पाठ के लिए यह राशि गुरुद्वारे में जमा कराई जाती है।चार-चार घंटे की अवधि में अखंड पाठ करने वाले ज्ञानियों को इसमें से भुगतान किया जाता है। 
दिवंगत के परिजनों द्वारा भोग (चाय-बिस्किट, भोजन) का खर्च वहन किया जाता है। 

सिंधी समाज की पंचायतों में यह व्यवस्था
शहर में सिंधी समाज की 30 से अधिक पंचायतें हैं। सभी के नियम, विधियां एक-दूसरे से जुदा हैं।पूज्य लाड़काना पंचायत के सचिव नरेश फुंदवानी के मुताबिक हमारी पंचायत के किसी सदस्य के निधन पर दाह संस्कार से लेकर तेरहवीं तक की विधि पंडित सम्पन्न कराते हैं। सूतक समाप्त होने के बाद संबंधित परिवार पंडित को दक्षिणा देते हैं। 
5100₹ से अधिकतम तक जो परिवार देना चाहे
सारी शोक विधि का सामान आदि परिवार का ही लगता है। यह परिवार पर निर्भर है कि वह दक्षिणा 5100 सौ दे या अधिक। सम्पन्न परिवार 21 से लेकर 51 हजार तक भी देते हैं। गरीब परिवारों में शोक कर्म विधि बिना दक्षिणा के भी सम्पन्न कराने के उदाहरण हैं। 
सरकार पंडितों का भी सम्मान करे 
लाड़काना पंचायत के सदस्यों का दाह कर्म विधि सम्पन्न कराने वाले पं हरीश चंद्र शर्मा का कहना था कोरोना संकट के दौरान पंचायतों के पंडितों ने कोरोना का शिकार व्यक्तियों के समस्त शोक कर्म सम्पन्न कराए हैं।जिले की सीमा सील होने से दसवें आदि की विधि भी स्थानीय मंदिर में सम्पन्न कराई, सरकार यदि डाक्टरों-अन्य कर्मचारियों का सम्मान कर सकती है तो पंडितों की सामाजिक भागीदारी का भी सम्मान करे।

हर कार्य के शुल्क निर्धारित कर बोर्ड 
लगा रखे हैं रामबाग मुक्तिधाम पर 
शहर के श्मशानघाटों में फिलहाल रामबाग मुक्तिधाम जैसी सुचारू व्यवस्था अन्यत्र नहीं है।इस श्मशानघाट में महाराष्ट्रीयन समाज के सदस्यों का दाह संस्कार अधिक होता है।मुक्तिधाम एवं दशा पिंड विकास समिति ने अपने समाज के पंडितों से चर्चा पश्चात सदस्य के दाह संस्कार संबंधी शुल्क 
निर्धारित कर बोर्ड लगा रखे हैं। 
महाराष्ट्रीयन समाज के सदस्य के निधन पर निर्धारित शुल्क इस प्रकार है
1300 ₹ : पहला दिन (दाह संस्कार मंत्राग्नि विधि) और तीसरे दिन की विधि। इस राशि में सामान-दक्षिणा शामिल है।
2000 ₹ : नौवें, दसवें, ग्यारहवें, बारहवें की विधि। इस राशि में भी सामान-दक्षिणा शामिल है।यह व्यवस्था बीते दस साल से चल रही है। 
विकास समिति अध्यक्ष सुधीर दांडेकर के मुताबिक तेरहवीं के कार्यक्रम के लिए रामबाग पेट्रोल पंप के सामने स्थित समाज के भवन में तीसरी मंजिल पर रसोईघर और दो सौ लोगों की भोजनक्षमता वाले हॉल का निर्माण भी जारी है। 
इसी के साथ उठावने-शोक बैठक आदि के लिए भी हॉल का उपयोग सभी समाज कर सकेंगे, इसका शुल्क निर्धारण किया जाना है। 

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बार-बार जात पूछ कर जलील करते रहे, दाह कर्म कराने वाले पंडे ने पहले ढाई हजार, फिर दो हजार और मांग लिए 
आप बीती/प्रशांत रायचौधरी
इंदौर अभी कुछ दिन पहले ही फिल्म ‘कागज’ देखी थी जिसमें ‘मृतक’ पंकज इस सिस्टम के खिलाफ अंत तक लड़ते हैं। सिस्टम की बात चली तो मुझे यह जानकर अफसोस हुआ कि श्मशान घाट भी इससे अछूते नहीं है। 8 जनवरी को जब हम अपनी बड़ी बहन के पार्थिव शरीर को लेकर तिलक नगर मुक्तिधाम इंदौर पहुंचे तो सबसे पहले हमसे पूछा गया आप की जात क्या है और आपका समाज क्या है। मुझे ऐसे प्रश्नों का अनुभव नहीं था। मृतक का आधार कार्ड भी चाहिए। उसके बिना शव का दहन नहीं हो सकता है।
सिर्फ इतना ही नहीं यह जानकर भी आश्चर्य होगा कि नगर निगम की पर्ची तो ₹3240 की बनी लेकिन पंडित जी ने पहले 2500 रुपए कहा और अंतिम संस्कार होने के बाद ₹2000 और मांगे। आप वहां भावनाओं से बंधे होते हैं इसलिए मोलभाव नहीं कर सकते हैं। शव के ऊपर लकड़ी रखने वाले ने ₹200, अंतिम संस्कार के बाद आधे अधूरे दो भजन गाने वाले ने ₹300 और श्मशान घाट के चौकीदार ने ₹100 ले लिए। श्मशान घाट ऐसा लग रहा था मानों धंधा हो। अभी व्यापार खत्म नहीं हुआ। 
दाह कर्म कराने वाले पंडा ने कहा तीसरे दिन अस्थियां उठाते टाइम मंत्र पढ़ने के ढाई हजार रुपए लगेंगे। कोरोना काल के कारण  हमने अपने दोस्तों को सूचित नहीं किया था। सिर्फ परिजन  ही मुक्तिधाम में  थे। बात पैसों की नहीं सिस्टम की चालाकी की है जिसमें वे मनमाना तरीके से रुपए बढ़ाते जाते हैं और आप पाते हैं आंखे आंसुओं से नहीं  गुस्से से लाल होती जा रही हैं। अगर आपको जात लिखना है तो फॉर्म भरने के समय लिखते ही हैं लेकिन वहां काम करने वाले हर कर्मचारी ने क्यों पूछना चाहिए कि आप की जात क्या है। क्या उनको नहीं दिखता है कि हम मानव जात के हैं। प्रभारी ने यह भी कहा कि जाति के आधार पर मृतक की अंत्येष्टि के लिए दिशा तय की जाती है। आप समझ में नहीं आ रहा है कि आत्मा जब उड़ चुकी है तो शरीर किसी भी दिशा में हो इससे दशा सुधरने वाली है क्या?
सामान में पैसा लगता है, उसके सहित दक्षिणा ली
राय चौधरी परिवार में दाह संस्कार कराने वाले देव कल्याणी पहले तो नकारते रहे कि खुद हमारे परिवार में शोक है, मैं नहीं गया। कुरेद कुरेद कर पूछने पर बोले मेरा भाई कृष्णा गया होगा। फिर बोले कुल 45सौ रू में ढाई हजार का सामान और दो हजार दक्षिणा के दिए है। उन्हें इस राशि के संबंध में बता दिया था।

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